आरक्षण, योग्यता, इमानदारी और हकीकत

🔥आरक्षण, योग्यता, इमानदारी और हकीकत🔥
                     दिनांक 22-11-2019
   आज-कल इस पर चर्चा एक साधारण बात हो गई है और किसी को असहज महसूस भी नहीं होता है। क्या जमाना आ गया है? आरक्षण की वज़ह से, 40% वाला इंजीनियर, डॉक्टर या बाबू बनेगा और 90% वाला चपरासी! नहीं तों बेरोजगार घूमेगा! इनकी वज़ह से सरकारी अस्पताल में जानें में डर लगता है। पुलिया टूट रहीं हैं, रेल दुर्घटना ज्यादा होने लगी है। रोड की खस्ता हालत होने से दुर्घटनाएं बढ़ गई है। कानून व्यवस्था चौपट हो गई है,आदि आदि। बहुत कुछ सुनने को मिलता रहता है।
   ऐसे सवाल क्यों?, कारण क्या है? हक़ीक़त जानना भी जरूरी है।
   ब्राह्मणवादी व्यवस्था स्वतंत्रता से पहले ,बाद में और आज भी, समाज में किसी भी कीमत पर तथा- कथित ब्राह्मणी वर्चस्व  की भूमिका को बनाए रखने की कोशिश करता रहता है, जो हकीकत से कोसों दूर है।
   भारत देश के सभी विद्वान, महापुरुष और यहां तक कि तथाकथित इनके भगवान भी शूद्रों में ही पैदा हुए हैं। नज़र उठाकर देखिए ब्राह्मणों में कोई विद्वान या महापुरुष पैदा नहीं हुआ है। लेकिन हेकड़ी से बाज़ नहीं आएंगे।इसी हेकड़ी के कारण ही आजJ. N.U  में एकलव्य पैदा करने की कोशिश की जा रही है।
     कुछ उदाहरण देना उचित समझता हूं।
   1)- दक्षिण भारत के राज्यों में रिजर्वेशन कोटा ज्यादा होने के कारण ही वहां का शासन प्रशासन उत्तर भारत की तुलना में बहुत ही अच्छा है।
   2)-मैं खुद रिजर्वेशन में नहीं आता था। हिन्दू डिग्री कालेज जमानियां, गाजीपुर, 1971, B.Sc. FY(PCM) 71 विद्यार्थी थे, सिर्फ 7 ही पास हुए, सिर्फ मैं अकेला पहले साल में पास होने वाला था, बाकी 6 रिपीटर पास हुए थे। फिजिक्स और केमिस्ट्री प्रैक्टिकल में मुझे सिर्फ पासिंग मार्क दिया गया था। सभी सवर्ण प्रोफेसर,  जिनको 98% तक मार्क दिए थे,वे सभी विद्यार्थी फेल हो गए थे।
  3)- 1990 दिसम्बर की बात हैं। पी सी एम् रिपेयर सेंटर में मैं जूनियर टेलकॉम आफिसर की हैसियत से काम कर रहा था। बातचीत के दौरान हमारा बास श्री पुरोहित, एक S.T. JTO जो हम सभी की सीनियारिटी को लांघते हुए जल्दी प्रमोशन पा गया था, उसपर अभद्र कमेंट कर दिया। मैं तो चौक गया, कुछ लोग हां में हां मिलाते गये। मुझे टिप्पणी बर्दाश्त नहीं हुई और मैंने बास को टोक ही दिया। कहा सर जी, आज के माहौल में 100 ब्राह्मणों को इंजिनियर बनना जितना आसान है, उतना ही एक ST का इन्जीनियर बनना कठिन है। आप लोग ऐसी परिस्थिति पर क्यो नही सोचते हैं?
  4)-16 साल तक अकेले वर्कशाप सम्हालते हुए, खुलेआम कांशीराम जी के बामसेफ में काम करते हुए भी मजबूरन 1989 में मुझे "संचार श्री"एवार्ड से सम्मानित करना पड़ा था।
  5)- जुलाई 1996 में मुझे पहली बार सहायक सतर्कता अधिकारी (AVO) की एक ब्राह्मण को रिप्लेस करते हुए पोस्टिंग हुई। छान बीन में पाया कि सिर्फ 10-12 शूद्रों को ही विजिलेंस केस में बुक किया गया था। कुछ एजेंट आते और कहते थे कि, साहब, हम लोग केस देंगे और समझौते की आमदनी का 50-50.।दुद्कारते हुए भगाना पड़ा था।
    5)-आश्चर्य तब हुआ! जब एक  इमानदार SC आफिसर (मराठी) ने केबिन में बीजी होने के कारण, एक ब्राह्मण (मराठी) कस्टमर को अंदर आने से रोक दिया था। ब्राह्मणी इगो के कारण इन्सल्ट महसूस किया और फर्जी कम्प्लेन करके बुक करवा दिया था। यह बात मुझे तब मालूम पड़ी, जब इन्क्वाइरी करने वाला अधिकारी उससे पूछताछ करने के लिए, मुझे भी साथ में उसके घर ले गया। हम दोनों को सिंह समझकर, कम्प्लेन का कारण बताते हुए अभद्र टिप्पणी कर दिया।यह बात मैंने GM(V) को बताई।
  6)-मैंने 7 सालों में करीब करीब 400 Class-1&2 अधिकारियों को बुक करते हुए MTNL Mumbai में हड़कंप मचाते हुए भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा दिया था। मैंने पाया सिर्फ 10% शूद्र भ्रष्टाचार में लिप्त थे और वे भी सवर्णों का साथ मिलने के कारण।
  7)-ओपेन मीटिंग में किसी के प्रति नफ़रत , सवाल उठने पर मैंने कहा था कि मैं अपना काम ईमानदारी से बिना पक्षपात के करता हूं। पहले पक्षपात होता था , मैंने प्रमाण के साथ साबित किया कि ज्यादातर शूद्र तनख्वाह से ख़ुश रहता है। नौकरी जाने का उसे डर ज्यादा  रहता है इसलिए इमानदारी से वह काम भी करना चाहता है, वशर्ते उसे कोई दबाव न डालें।
   8)-मेरा अनुभव रहा है कि बहुत से सरकारी संस्थानों में शूद्रों को जानबूझ कर अयोग्य साबित करने की कोशिश की जाती है और रिजर्वेशन का तगमा लगा दिया जाता है, जबकि हकीकत विपरित है।
  9)- ऐसी आवाज भी मेरे कानों तक पहुंची है कि, जब कोई शूद्र भ्रष्टाचार में पकड़ा जाता हैं तों तुरंत कमेंट "अपनी जाति पर आ गया" और वहीं सवर्ण के लिए, बेचारा भ्रष्टाचार नहीं करेगा तो स्टेटस कैसे मेन्टेन करेगा?
  10)-सभी सरकारी संस्थानों में, वर्धापन दिवस या स्थापना दिवस के नाम पर सत्यनारायण पूजा व कथा रखी जाती है, जो कानूनन ग़लत है, ख़ूब धूमधाम से मनाया जाता है और संस्थान इसके लिए पैसा भी देता है।
  एक बार हमारे ही बुद्धिष्ट दोस्त को मंडल अभियंता (बिल्डिंग) होने के नाते इस पूजा समिति का अध्यक्ष बनाया गया था, उन्होंने इमानदारी से वखूबी निभाया। मैंने कहा था कि यह गैर सरकारी काम था, आप अपने धर्म का हवाला देकर, अध्यक्ष बनने से मना कर सकते थे या अपने दूसरे अधिकारी को अध्यक्ष बना दिए होते? उनका एक ही उत्तर था," इन लोगों के साथ कन्ट्रोवर्सी क्यो मोल लेने का?
    मेरा अनुभव रहा है कि आरक्षण वालों पर इतना मानसिक दबाव बना दिया जाता है कि, उसकी सत्य के खिलाफ बिरोध की भावना भी दब जाती है।
  मैंने जब अपने रजिस्ट्रर्ड को-आप हाउसिंग सोसाइटी के अध्यक्ष पद सम्हाला तब से 7-8 साल तक सत्यनारायण कथा नहीं होने दिया। बीजी होने के कारण दो साल पहले छोड़ते ही कथा शुरू हो गई, फ़िर अकेले ही जबरदस्त विरोध किया। परिणाम सोसाइटी का पैसा कथा में नहीं लगेगा।


      थोड़ा डाक्टरों के बारे में भी जान लेते हैं।
  11)-जब कभी कोई हमारे परिवार में या दूरदराज़ की रिस्तेदारी में कोई गम्भीर बिमारी होती है तो, उसे मैं पहला सुझाव अच्छे म्युनिसिपल या सरकारी अस्पताल में ही जाओ।
  कारण वहां डोनेशन और पैसे के बल पर डिग्री खरीदने वाले नहीं पहुंच पाते हैं। ज्यादा से ज्यादा रिजर्व कैटेगरी के परिश्रमी, इमानदार और कम्पटीशन से आए कुशल डाक्टर की देखरेख में इलाज होता है। कोई दो राय नहीं, भीड़ वहां बहुत ज्यादा होती है, डाक्टरों पर वर्कलोड बहुत ही ज्यादा होता हैं, इसके कारण अनुभवी बहुत जल्दी बन जाते हैं। पेशेंट और डाक्टर दोनों के लिए लक्जरी लाइफ नहीं होती है, लेकिन इलाज सस्ता और सही होता है। भीड़ का कारण भी यही है कि अंग्रेजों ने जितने मुम्बई में सरकारी अस्पताल बनवाएं हैं, इसके 70 सालों में 10% भी नहीं बढ़ा पाएं है और इस सरकार की पालिसी भी यही है कि जो सरकारी है उसे भी प्राइवेट कर दो।
  12)- 1996 में,हमारी मिसेज को रीढ़ की हड्डी L-4, L-5 में विकृति आने के कारण बहुत तकलीफ़ थी। शुरुआत में प्राइवेट में दवा करवाया, तय हुआ कि बिना आपरेशन ठीक नहीं होगा। मैं सरकारी अधिकारी था।अच्छे अच्छे प्राइवेट हास्पिटल पैनल पर थे, फिर भी मैंने म्यूनिसिपल कूपर अस्पताल में आपरेशन करवाया, आज तक उससे सम्बन्धित कोई तकलीफ़ नहीं है।
    13)-1998 में मुम्बई में हमारे मामा का रोड ऐक्सिडेंट हों गया था।कमर के नीचे हिप ज्वाइन्ट टूटकर एक पैर लटक गया। तुरंत उसी हास्पिटल में भर्ती किया। यल टाइप रिचर्ड प्लेट लगाकर,नट बोल्ट से लकड़ी की तरह ऐसा जोड़ दिया कि, आपरेशन के बाद लगता ही नहीं था कि इनका आपरेशन हुआ है।
    14)-एक साल पहले हमारे भाई की गांव में छत से गिरने के कारण रिढ़ की हड्डी टूट गई थी। गांव से यहां लाकर म्युनिसिपल हास्पिटल K E M मे उस रीढ़ की हड्डी को दोनों तरफ़ से राड लगा कर स्क्रू की सहायता से लकड़ी की तरह जोड़ दिए। आज़ गांव में एक दम ठीक-ठाक है।
  15)-अभी अभी ५ महीना पहले हमारी मिसेज को बहुत ही टिपिकल, असहनीय दर्द के साथ ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया (बहुत ही कम लोगों में यह बिमारी होती है) की शिकायत हुई।
 कैशलेस CGHS कार्ड धारक होने के कारण पैनल के प्राइवेट हास्पिटल में भर्ती कराया।हफ्ते भर में और हालात ख़राब होती गई, टोटली बेड पर हो गई। लगा कि यहां बचेगी नहीं। डिस्चार्ज लिया और सरकारी सर जे जे अस्पताल में भर्ती कराया। वहां भी कंडिशन बनतीं बिगड़ती गई । वहां रिसर्च व बिमारी देखने के लिए बहुत लोग आते थे। इम्प्रूव न होता देख कुछ इक्स्पर्ट डाक्टरों का पैनल दो -तीन यम आर आई कराने के बाद इस डिसिज़न पर पहुंचे कि यह ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया नहीं है। यह उससे भी रेयर बिमारी जो लाख-दो लाख में एक को होती है, ग्लैसो फरान्जिया न्यूराल्जिया हैं। सही दवा शुरू हुई। फिर भी तीन महीने तक रही, दो बार IMCU मे और एक बार CCU में एक एक हफ़्ते के लिए भर्ती किया गया। CCU से एक बार तों काल आ गया कि, धड़कन बंद हो गई, हास्पिटल आ जाइए। मैं निकला भी लेकिन रास्ते में आधे घंटे में फिर ख़बर आईं,आराम से आइए धड़कन चालू हो गई ।जिसे डाक्टरों ने सूझबूझ के साथ सीपीआर के माध्यम से चालू कर दिया था।
 एक महीने से मिसेज घर पर हैं, तीन महीने तक मुंह से खाना नहीं खाया था बोलती भी बन्द थी। इसलिए कमजोरी स्वाभाविक है। अब सभी पैरामीटर से एकदम ठीक है, थोड़ा बहुत चलने फिरने लगी है।
   16)-आप सभी को अनुभव बताने का मेरा मंतव्य यह है कि, बहुत से शूद्रों को भी अपने लोगों पर भरोसा नहीं है।
    केस कहीं खराब न हो जाए, यह सामाजिक दबाव या डर सवर्णों की अपेक्षा शूद्रों में ज्यादा रहती है, इसलिए काम के प्रति सजग और इमानदार रहते हैं।
  मैंने देखा है कभी कभी इसी सामाजिक दबाव के कारण, मेजर आपरेशन के समय इन्चार्ज यदि शूद्र है तो आपरेशन के समय वहां मानिटर करता है, जब कि सवर्ण सोचता है मेरी क्या जरूरत है?
   17)-एक बार मुम्बई के पोश इलाके के चौराहे पर एक बोर्ड लगा था, -- लिखा था।
 " रोग से नहीं, डाक्टरों से डर लगता है" मैंने थोड़ा करेक्शन करने का सुझाव दिया।
"रोग से नहीं, प्राइवेट डॉक्टरों से डर लगता है"
    18)-आइए कुछ प्रैक्टिकल अनुभव के साथ साथ, मनोवैज्ञानिक गुणों के आधार पर इसका आंकलन करते हैं।
   हमारा अनुभव है कि हिन्दू धर्म को मानने वाला, कभी बौद्धिक इमानदार हो नहीं सकता। कारण,-जो हिन्दू धर्म के मूल तत्त्व, जाति-पाति, ऊंच नींच, छुवा-छूत को मानेगा, वह कभी इमानदार हो नहीं सकता।
  जितनी धर्म कट्टरता ➡➡ उतनी ही बौद्धिक बेईमानी।
   मैंने अनुभव किया है, जो ब्राह्मण जितना इमानदार होता हैं,वह उतना ही हिन्दू धर्म की मान्यताओं का विरोधी होता है।
    मैंने सर्विस पिरियड में ईसाई, मुस्लिम, सिख को इमानदार पाया, लेकिन कट्टर हिन्दू को नहीं। इसी अनुभव से मैं विजिलेंस में सफ़लता भी पाई।
  19)-अंग्रेजों ने भी यह माना है कि ब्राह्मणों में न्यायिक चरित्र की कमी होती है।
   20)-माफी चाहता हूं,यह मेरा परसनल अनुभव है, इंसान है, अपवाद भी हो सकता है। अब आप अपने अनुभव को स्वस्थ मानसिकता से आंकलन करें और शूद्रों के प्रति रिजर्वेशन के कारण अपनी गलत मानसिकता को सुधारने की कोशिश करें। धन्यवाद!
       ✊गर्व से कहो, हम शूद्र हैं✊
  आप का समान दर्द का हमदर्द साथी!
  शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
  मो०-W-9869075576