एक सोच ऐसी भी

मैं मित्र हूं, तुम्हारा कल्याण मित्र .न तो तुम्हारा गुरु हूं न तुम मेरे शिष्य. और भविष्य में मेरा पुनः आगमन होगा तो मेरा नाम होगा 'मैत्रेय'.. तब मैं परिपूर्ण मित्र रूप में होऊंगा.
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मेरा कोई गुरु नहीं है, मैंने गुरुओं से नहीं पाया. मेरा कोई आचार्य या उपाध्याय नहीं है. मैं किसी धर्म को नहीं मानता मेरी किसी शास्त्र में श्रद्धा नहीं है क्योंकि मैंने जो पाया है अपने से पाया है. ऐसा नहीं है कि मैं गुरुओं के पास नहीं रहा.  रहा, लेकिन वहां मुझे कुछ मिला नहीं और जब मिला तब मैं किसी गुरु के पास नहीं था .
        जो मैंने पाया है वह कुछ ऐसा है कि अब मैं तुमसे कह सकता हूं कि उसे किसी और के पास लेने जाने की जरूरत नहीं है अपने भीतर ही उतरो तो तुम्हें भी मिल जाएगा .
         शास्त्रों में नहीं , सत्य स्वयं में है शब्दों और सिद्धांतों में नहीं, तुम्हारी चेतना में बसा हुआ है चित्त को जागृत कर तुम भी जानो. जो है तुम्हारे भीतर हैं तुम्हारे स्वभाव में छिपा हुआ है क्योंकि जो मिलना है वह तुम्हारे भीतर पड़ा है कोई दूसरा थोड़े ही देने वाला है सत्य कभी ट्रांसफर नहीं होता, भीतर होता है. गुरु अगर कुछ करता है तो इतना ही कि तुम्हारे भीतर जो पड़ा है उसको पुकारता है. उसे तो तुम स्वयं भी पुकार सकते हो. तुम अपने स्वामी स्वयं हो ,कोई और नहीं.
            इसलिए बुद्ध के मार्ग पर गुरु अनिवार्य नहीं है. तुम खुद ना पुकार सको तो गुरु की जरूरत है क्योंकि खजाना तुम्हारे भीतर है .तुम खुद भी भी खोज सकते हो . गुरु तुम्हें खदान खोदकर धन नहीं देगा. सिर्फ इतना ही कह देगा कि जिस तरह मैंने अपने भीतर खोदा, खोजा और पाया इसी तरह तुम भी अपने भीतर खोज लो . मैं तृष्णा से मुक्त और तृष्णा के नाश से विमुक्त हूं. मैं अलिप्त व सर्वत्यागी हूं. मैं सभी को परास्त करने वाला हूं, मेरे  जितने शत्रु थे वे सब गए, मैं सब जानता हूं  और जो जानने योग्य हैं वह मुझे  दिखाई पड़ रहा है.
         इसलिए जब मैं खुद ही ज्ञान को जानकर जागा और पाया तो अब किसको गुरु कहूं और मैं किसको शिष्य सिखाऊं. मैंने किसी से नहीं पाया. मैंने अपने भीतर पाया और जो मेरे पास आएंगे वह भी अपने भीतर ही पाएंगे. ध्यान से, मन को विकारों से निर्मल कर , चित्त को जाग्रत करके. बुद्ध पुरुष तो सिर्फ़ इशारा करते है चलना तो तुम्हें ही पड़ेगा.
ज्ञान की प्राप्ति के बाद जब भगवान बुद्ध अपना साथ छोड़ गये पंचवर्गीय भिक्षुओं को उपदेश देने के लिए उरूवेला से काशी की ओर आ रहे थे तो रास्ते में एक आजीवक मिला. वह तथागत को देखकर चकित हो गया. चेहरे का तेज ओजस्व, ज्योतिर्मय, निर्मल आंखें, शुद्ध इंद्रियां,अद्भुत आभा. ..वह बोला: आवुस ! तेरी इंद्रियां परिशुद्ध और विमल है ,किस उद्देश्य से दीक्षित हुए हो, तुम्हारे शास्ता कौन है, गुरु कौन है, किस धर्म को मानते हो? 
तब भगवान बुद्ध ने यह गाथा कही-----
सब्बाभिभू सब्बाविदूहमस्मि सब्बेसु धम्मेसु अनुलित्तो ।
सब्बन्नहो तण्हक्खये विमुत्तो सयं अभिन्नाय कमुद्दिसेय्यं ।।
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