पैसे की तुलना जेब में रहने जैसी क्यों

पैसे दिल की बजाए जेब में रहे, तो ही बेहतर हैं...
हमें सिर्फ धन दौलत इकट्ठा ही नहीं करना है .जरूरत है दुखों को दूर कर खुशहाली पैदा करना .क्योंकि दौलत का काम है सुविधाएं जुटाना. धन अपने आप में खुशहाली नहीं है धन सिर्फ साधन है जो हमारा बनाया हुआ है . सेहत, परिवार की सुख शांति से बढ़कर पैसे को बड़ा नहीं बनाना है. 
     सवाल यह है कि धन बुरा है या अच्छा ? उत्तर है.धन बुरा भी नहीं तो अच्छा भी नहीं है. यह तो सिर्फ एक साधन है. हर कोई चाहता है कि उसकी जिंदगी खुशहाल हो और खुशहाली कई तरीकों से आती है. अगर शरीर निरोगी खुशहाल हैं तो उसे स्वास्थ्य या आराम कहते हैं. यदि मन खुशहाल है तो इसे शांति कहते हैं .इसका अगला स्तर आनंद है यदि भावनाएं खुशहाल है तो यह प्रेम है. अगला स्तर करुणा है.
       अगर खुशहाली आपके मन व जीवन ऊर्जा तक पहुंचे तो इसे परम आनंद कहते हैं. दरअसल पैसा बाहरी खुशहाली जुटाता है यह आंतरिक खुशहाली और आनंद नहीं दे सकता . आपके पास बहुत सारा धन है तो आप फाइव स्टार होटल में ठहर सकते हैं , ऐशोआराम की महंगी चीजें खरीद सकते हैं लेकिन यदि आप शरीर , मन, भावना या ऊर्जा के स्तर पर खुश नहीं है, आनंदित नहीं है तो आप जीवन का मजा नहीं ले पाएंगे लेकिन यदि यह चारों आयाम खुशहाल हैं तो आप एक पेड़ की शीतल छाया के नीचे चारपाई पर सादा खाना खाते हुए भी उतना ही आनंद ले सकते हैं जितना कि कोई फाइव स्टार होटल का. 
      क्या इसका मतलब यह है कि दौलत नहीं होनी चाहिए? ऐसी बात नहीं है जीवन में पैसे का बहुत महत्व है लेकिन आपको अपनी प्राथमिकता समझनी होगी कि आपको सिर्फ धन चाहिए या स्वास्थ्य, संतोष और आनंद भी .बात इतनी सी है कि पैसा सिर चढ़कर बैठ जाए तो दुख और परेशानियां ही आएगी और यदि धन खुद की खुशहाली के साथ दूसरों को भी दिया जाए, लुटाया जाए तो आनंद ही आनंद है.
     भगवान बुद्ध कहते है..आरोग्य सबसे बड़ा सुख व लोभ से परे संतोष सबसे बड़ा धन है. जिसकी आवश्यकताएं बहुत कम है, कम साधनों में भी आनंदित रहता है , ध्यान द्वारा मन को काबू कर निर्मल करता है ऐसे जागृत व्यक्ति के जीवन  में दूर दूर तक दुख नजर नहीं आएगा.
              सबका मंगल हो
      संसार के सभी प्राणी सुखी हो
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