ना कोई मांग ना कोई आंदोलन, फिर भी बढाएगी सरकार आरक्षण

ना कोई मांग ना कोई आंदोलन, फिर भी बढाएगी सरकार आरक्षण


Published On :    4 Dec 2019   By : MN Staff


एससी-एसटी के #राजनीतिक_आरक्षण को दस साल बढ़ाने का फैसला


नई दिल्ली : लोकसभा और देश की सभी विधानसभाओं में एससी-एसटी व एंग्लो इंडियन के राजनीतिक आरक्षण को अगले दस साल तक बढ़ाने के लिए संभवता इसी सत्र में प्रस्ताव आएगा जिसे पारित किया जाएगा. हालांकि, यह प्रक्रिया 1960 से लगातार जारी है.


लेकिन, वर्तमान माहौल में यह इसलिए भी अहम है. क्योंकि, विपक्ष का एक खेमा मोदी सरकार को अनु.जाति-जमाति विरोधी करार देने की कोशिश करता रहा है. जबकि, खुद मोदी कई बार यह कहते रहे हैं कि उनके रहते आरक्षण खत्म नहीं हो सकता है. ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार जो आरक्षण दस साल के लिए बढ़ा रही है वह #राजनीति_आरक्षण है. 


यह #नौकरीवाला आरक्षण नहीं हैं.


गौरतलब है कि संविधान की धारा 334 के अनुसार, इस आरक्षण का प्रावधान किया गया था. लेकिन, यह सिर्फ #दस_साल के लिए था. उसके बाद से हर दस साल में संविधान संशोधन के जरिए यह अगले दस साल के लिए बढ़ाया जाता रहा है. आखिरी बार २००९ में यह पारित हुआ था जो २०२० तक के लिए लागू है. अगर, इसे पारित नहीं किया गया तो आने वाले विधानसभा चुनावों में आरक्षण प्रभावी नहीं होगा.


मंगलवार को एक उच्च स्तरीय मंत्रिमंडल समूह की बैठक में इस पर फिर से विचार हुआ और तय हो गया कि यह आरक्षण लागू रहेगा. इस समूह में गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत कुछ अन्य मंत्री शामिल हैं. संभवत: बुधवार को होने वाली कैबिनेट बैठक में ही यह प्रस्ताव लाया जाएगा. 
वैसे सूत्रों के अनुसार, एंग्लो इंडियन के लिए नामांकन के जरिए आरक्षण पर विचार का प्रश्न आया था. दरअसल, पिछले सत्तर वर्षो में उनकी जनसंख्या बहुत कम हो गई है. हालांकि, सूत्रों का कहना है कि सरकार फिलहाल इसमें कोई छेड़छाड़ नहीं करना चाहती है.


यूं तो यह एक संवैधानिक परंपरा की तरह चली आ रही है. लेकिन, आज के राजनीतिक परिदृश्य में इसका खास महत्व इसलिए है. क्योंकि, भाजपा पर अक्सर एससी-एसटी विरोधी हाने के आरोप लगे हैं. यहां तक कि एससी-एसटी उत्पीड़न पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के लिए भी सरकार को ही कठघरे में खड़ा किया गया था. गौरतलब है कि लोकसभा में एससी-एसटी और एंग्लो इंडियन के लिए १३१ सीटें आरक्षित होती है.


बता दें कि सरकार जो आरक्षण दस साल के लिए बढ़ाना चाहती है वह नौकरीवाला आरक्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक आरक्षण है. खास बात यह है कि  इस आरक्षण को बढ़ाने के लिए ना कोई आंदोलन करता है और ना ही कोई मांग करता है. 


फिर भी सरकार यह आरक्षण हर दस साल के लिए बढ़ा देती है. ठीक इसके विपरित जिस आरक्षण से एससी, एसटी को नौकरी मिलती हैं उस आरक्षण को निजीकरण के माध्यम से खत्म किया जा रहा है. जिसे बचाने के लिए पूरे भारत भर आंदोलन आज भी जारी है. लेकिन, सरकार इसके तरफ ध्यान नही देती. आज सरकारी कंपनियों का निजीकरण होने से नौकरीवाला आरक्षण खत्म होने के कगार पर है.


दूसरी तरफ सरकारें राजनीतिक आरक्षण हर दस साल इसलिए बढ़ा देती है, ताकि उनके पार्टी के लिए वोट का जुगाड़ हो सके. क्योंकि एससी-एसटी के उम्मिदवार जिस पार्टी से चुनकर जाते हैं उसी पार्टी के लिए काम करते हैं. वे अपने समाज के लिए काम नहीं करते. यह आरोप आज तक उन पर लगे हैं. इन लोगों के बारे में खुद डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर कहते थे कि एससी, एसटी से चुनकर जाने वाले प्रतिनिधी संसद में अपना मुंह नहीं खोलते. उनकी यह बात आज सच साबित हो रही है. 


एससी एसटी के अधिकार खत्म होने की कगार पर है और राजकीय दलों द्वारा चुनकर जाने वाले एससी, एसटी के विधायक, सांसद इस पर कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे प्रतिनिधी समाज के लिए निकम्मे साबित हुए हैं. यह लोग समाज के साथ गद्दारी करते हैं ऐसे गद्दार लोगों के लिए सरकारें हर दस साल के लिए राजनीतिक आरक्षण बढ़ाने का काम करती है.
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