ऐसी औलादों को जन्म देने से बेहतर है कि कोई भी महिला बांझ होने का दंश झेल ले

ऐसी औलादों को जन्म देने से बेहतर है कि कोई भी महिला बांझ होने का दंश झेल ले। कम से कम न आस होगी न निराशा हाथ आएगी। आज छतरपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने आत्मा को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया है। शायद आज मेरे शब्द अपनी मर्यादा खो रहे हैं और आंखों से भावनाओं की बाढ़ सीमाएं लांघ रही है। क्योंकि आज एक बूढ़ी माँ की वेदना का दर्दनाक अंत हुआ है। मैं कई बार वृद्धाश्रम स्टोरी के लिए गई हूं मैंने वहाँ बूढ़े माँ बाप का दर्द महसूस किया है। व्यथित करती हैं ऐसी मार्मिक सच्चाई जहां आप कुछ नहीं कर पाते बस मूक दर्शक बनने की मजबूरी हो। 


रिश्तों को तार-तार और मानवता को शर्मशार कर देने वाला मामला  यह है कि एक वृद्ध माँ का बेटों ने अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। क्योंकि उसकी पत्नी ने सास की लाश घर लाने और मुखाग्नि देने से मना किया था। पत्नी के इशारे पर पहले ही मा को घर से निकाल कर वृद्धाश्रम फेक आये थे। बेटी ससुराल से आकर माँ के शव से लिपट लिपट रोइ लेकिन लाचार थी पता नहीं किस बात की लाचारी थी जो माँ की बीमारी का इलाज भी जिंदा रहते नहीं करवा पाई। पिछले कई सालों से वृद्धाश्रम में रहने वाली माँ का अंतिम संस्कार वृद्धाश्रम वालो को करना पड़ा। 


उम्र के अंतिम पड़ाव पर एक बीमार बूढ़ी माँ वृद्धाश्रम की चारपाई में लेटी यही सोचती होगी कि मौत सी प्रसव पीड़ा सहकर जिन औलादों को हृदय से लगाकर अमृत रूपी दुग्धपान करवाया बुढ़ापे का सहारा बनेगी। लेकिन जरा सोचिए कैसे एक औरत जो पल पल मौत की राह देख रही होगी कि कम से कम उसके बच्चे उसके अंतिम संस्कार में ही सही उसके करीब तो आएंगे। लेकिन जिंदगी की तरह मौत ने भी उसकी उम्मीद तोड़ दी। 


एक माँ का अंतिम समय जब पास आया होगा तो कितनी व्याकुल हुई होगी। बच्चों के दीदार के लिए इंतजार करते हुए आंखे पथरा गई होगी। खून के आंसुओं के बीच बच्चों की तस्वीर धुंधली दिखाई दे रही होगी। दिल कितना बिलख रहा होगा। कितनी तड़प होगी उस माँ के आंचल में जिसमें अपने बच्चों को कड़ी धूप, गिरते पानी और ठंड से बचाया होगा। जाते जाते बस यही कामना होगी कि बच्चों का स्पर्श मिल सके। उन्हें सीने से लगा सके प्यार कर सके दुलार कर सके। लेकिन जाते जाते भी उसके लबों पर बच्चों के लिए दुआ ही रही होगी। 


लेकिन कमीने पन की मिसाल बन बेटे अपनी बीवी के पल्लू से बंधे रहे। जो बेटा अपनी माँ का सगा न हो सका आज बीवी का आज्ञाकारी बन गया। क्या गैरत मर गई या खुद को नाजायज और अनाथ मानता है। कितना गिरा हुआ बेशर्मी की कितनी मोटी चमड़ी से बना होगा यह इंसान है जिसे उसकी माँ की मौत की खबर भी पसीज न सकी। अपनी माँ की मौत का अंतिम संस्कार न करने की बात कहने के लिए वो जिगर से कहाँ से लाया होगा। गालियां बहुत लिखना चाहती हु लेकिन अभद्रता मेरे लहजे में नहीं। 


PC- राजेश चौरसिया (छतरपुर)


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