बामसेफी अपने उद्देश्यों से भटक गये

🔥बामसेफी अपने उद्देश्यों से भटक गये हैं🔥
                   दिनांक 30-03-2020
  दिसंबर 2019 में बामसेफ के एक अधिवेशन में भाग लेने तथा अनुभव किया कि सभी बामसेफी घड़े क्रिसमस की छुट्टियों के दौरान ही अपना -अपना सालाना अधिवेशन अलग-अलग स्थानों पर क्यों करते हैं?और क्या हासिल करना चाहते हैं? तभी सै मेरे दिमाग में इस मिशन के प्रति कुछ लिखने की प्रेरणा हो रही थी, लेकिन कयी कारणों से लिख नहीं पाया। आज लाकडाउन समय में मन बन ही गया।
  1)- बामसेफ क्या है? BAMCEF
  Backward (SC.ST.OBC) And Minority Community Employees Federation
 2)- मान्यवर कांशीराम जी, आर्डनेंस फैक्ट्री पूने में आफिसर ग्रेड में काम कर रहे थे। पंजाब के रमदसिया सिक्ख धर्म के होने के कारण निडर, परीश्रमी, जुझारू और बगावती प्रवित्ति के थे। यहां तक कि मां बाप से भी बगावत कर सिक्ख धर्म की पगड़ी पहनने से भी इन्कार कर दिया था।
  3)- 1972 में उसी संस्थान में, दीनाबामा जीऔर खापर्डे जी का बाबा साहेब आंबेडकर जयंती को लेकर कुछ प्रसासन से विबाद हो गया। यह विवाद मान्यवर कांशीराम तक पहुंचा और इसी बीच, खापर्डे जी ने कुछ बाबा साहेब द्वारा हिन्दू धर्म के खिलाफ लिखित पुस्तकें पढ़ने को दिया। इन किताबों ने कांशीराम जी के बगावती प्रवित्ति को और विस्फोटक बना दिया और दीनाबामा जी का साथ देने के लिए प्रशासन से भी बगावत कर बैठे । समाज की उस समय की दशा और दुर्दशा देखकर इतने दुखी हुए कि नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ गई। इस बीच साहब आर पी आई से भी जुड़ गए थे, वहां भी उनका नेताओं से तालमेल बराबर नहीं हो रहा था। कुछ वहां से कटु अनुभव लेकर तथा उनके विचार में एक नई सोच कि, दलित सोसित समाज के हजारों लाखों संपन्न सरकारी कर्मचारियों को साथ में लिया जाय।  साथियों से विचार-विमर्श से एक सामाजिक संस्था बामसेफ के निर्माण का 1973 में विचार किया गया।
   4)- पांच साल तक गुप्त कार्य करते हुए, अथक परिश्रम से लगभग एक लाख तक सदस्यों की संख्या हो गई तो, 6 दिसंबर 1978 को दिल्ली के लालकटोरा मैदान में बिधिवत स्थापना हुई और मान्यवर कांशीराम जी अध्यक्ष बनाये गये।
  5)- उद्देश्य - उनकी एक सोच और अनुभव कि, पूरे देश में, केन्द्रीय, राज्य या अर्द्धसरकारी संस्थानों में, सभी जगह कर्मचारियों और अधिकारियों ने प्रशासन के सहयोग से एक संस्था,
  SC. ST. Employee Welfare Association.
 चल रही है, जो सिर्फ अपने स्वार्थसिद्धि और कुछ महापुरुषों की जयंती तक के लिए सीमित हैं। उनको अनुचित लग रहा था।
   उनकी सोच थी कि , जब आप को संविधान के मार्फत, रिजर्वेशन के द्वारा नौकरी मिली है तो उस बुद्धि और तनख़ाह से, उस रिजर्वेशन के अंश के बराबर का योगदान (कुछ पर्सेंट 10-20%), उस समाज को दे, जिनको रिजर्वेशन का फायदा नहीं पहुंचा है। मीन्स, मिशन---
   "Pay back to society"
6)- यह मिशन सफलता की राह पकड़ने लगा। मान्यवर कांशीराम जी की इमानदारी, लगन, मिशन के प्रति निष्ठा और कठिन परिश्रम से प्रभावित होकर सैकड़ों, हजारों फिर लाखों तक जुड़ने लगे। लेकिन यह एक ऐसा संगठन था जो समाज में दिखाई नहीं दे रहा था और समाज में खुलकर ओपन स्टेज से काम करने की मनाही थी।     बौद्धिक चेतना के लिए लिटरेचर तैयार करना, सामाजिक परिवर्तन में सहयोग करने वाले महापुरुषों की जीवनियां और उनके द्वारा लिखे गए साहित्य को भी प्रचारित करना। एक या दो दिन तक प्रशिक्षण शिविर के द्वारा लोगों को जागरूक करना। पहली प्राथमिकता अधिकतर लोगों को इस मिशन में शामिल करना होता था। सुरुवात में १० रुपया मंथली योगदान रहा था।
 एक रजिस्टर में  मेम्बर शिप दर्ज होती थी। शुल्क आप चाहें तो हर महीने दीजिए या साल भर का एक बार दे दीजिए। रजिस्टर ही सबकुछ था, और कोई रसीद नहीं। हिसाब किताब सब उसी रजिस्टर में, सबके सामने रहता था। कोई लीडर नहीं, एक संयोजक जिले वार, फिर राज्य स्तरीय संयोजक होता था। बड़े प्रोग्राम के लिए धनराशि, कूपन वितरण के माध्यम से होता था।
  7)-14 अक्टूबर 1981को बामसेफ का तृतीय अधिवेशन चंडीगढ़ में सम्पन्न हुआ। उसी दिन कांशीराम साहब ने एक बामसेफ नाम की 24 पेज की बुकलेट भी प्रकाशित किया।
  8)- कांशीराम साहब तो सर्विस छोड़ चुके थे, उनपर सरकारी कर्मचारी होने की कोई बंदिश नहीं थी। कुछ लोगों की राय बनी कि, इस मिशन को आम नागरिक तक भी पहुंचाया जाय, क्योंकि बामसेफ सदस्यों के काम करने का एक सीमित दायरा था। जिसको  सैडो आर्गनाइजेशन कहा जाता था। कुछ ज्यादा एक्टिव रहने वालों की सरकार मानिटरिंग भी करने लगी थी। 
   9)-इसको देखते हुए, 14 अप्रैल 1982 को DS-4, DSSSS, दलित सोसित समाज संघर्ष समिति, की स्थापना हुई, जिसका अध्यक्ष मान्यवर खापर्डे जी को बनाया गया। मैं भी इसी डी यस फोर के माध्यम से बामसेफ में सम्मिलित हुआ था।
 10)- DS-4 के माध्यम से आम जनता को जागरूक किया जाने लगा। इसके माध्यम से पूरे देश में, बहुत से सामाजिक आंदोलन चलाया गया। इनको भी प्रशिक्षित करने और धन मुहैया कराने की जिम्मेदारी बामसेफ की ही थी। इसका एक मुख्य स्लोगन था, जो बहुत ही चर्चित रहा।
   ब्राह्मण,क्षत्रिय, बनिया छोर।
   और बाकी सब डी यस फोर।।
  11)- कांशीराम जी को एक बाबा साहेब का कोटेशन "राजनीति एक ऐसी चाभी है, जिससे सभी समस्याओं के ताले खोले जा सकते हैं।" बामसेफ और डी यस फोर की सफलता से उत्साहित होकर कांशीराम जी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी की स्थापना किए। अध्यक्ष भी सर्वसम्मति से कांशीराम जी को बनाया गया। इसके बाद लीडरशिप की महत्त्वाकांक्षा, अंतर्विरोध के कारण अन्दर ही अन्दर  कुछ महाराष्ट्र के लीडरों में असंतोष पनपने लगा।
  12)- आर पी आई के कयी टुकड़े होने के कारण, बुद्धिष्ट लीडरशिप काफी बदनाम हो गयी थी। इसलिए इस बदनामी के कलंक से बचने के लिए खापर्डे, मेश्राम,और बोरकर जी की तिकड़ी ने 1985 में बामसेफ से कांशीराम जी को अध्यक्ष पद से हटा कर, तेजिंदर सिंह झल्ली को अध्यक्ष बनाते हुए बामसेफ का रजिस्ट्रेशन भी करवा लिए। पंजाब के ही एक चमार सरदार को दूसरे चमार सरदार से भिड़ा दिया। कांशीराम साहब बहुत दुखी तो हुए, लेकिन बिना विरोध के, उनके साथ जो भी समर्थक साथ आए, उनको लेकर अनरजिस्टर्ड बामसेफ चलाना शुरू कर दिये। मैं खुद कांशीराम जी के बामसेफ के साथ काम करने लगा। अब कांशीराम जी महाराष्ट्र छोड़कर अपने मिशन और बसपा को सफल बनाने के लिए उत्तर भारत की तरफ ज्यादा ध्यान देने लगे।
  13)- अब दोनों बामसेफ में कम्पटीशन चलने लगा। स्वाभाविक हैं,  मान्यता होने के कारण, कलेक्सन और मेम्बर बनाने में सफलता झल्ली जी को मिलने लगीं। झल्ली जी ने दिसंबर 1985 में दिल्ली में पहला अधिवेशन किया। लेकिन कांशीराम के व्यक्तित्व के सामने सफल नहीं हो रहें थे। धीरे धीरे DS-4 की पूरी की पूरी युनिट्स बसपा में शामिल हो गयी। कांशीराम जी राजनीतिक रूप से आगे बढ़ने लगे और तब यही लोग कांशीराम साहब का पोलिटिकली विरोध करने लगे। इन पर कांग्रेस समर्थित होने का लांछन भी लगने लगा। खुद एक बार राजीव गांधी जब कांशीराम जी से मिले तो, कांशीराम साहब ने पहला सवाल पूछा था कि, हमारे लोगों को तोड़ने के लिए कितने में खरीदा था। यह बात साहब अपने भाषणों में कह चुके हैं।
 14)- तेजिन्दर सिंह झल्ली पर अच्छा काम करने और अनरजिस्टर्ड बामसेफ को कमजोर करने का दबाव बढ़ने लगा और कहा गया कि आप भी नौकरी छोड़कर फुल टाइम काम करने की कोशिश करो। इस बिषय को लेकर अनबन होने लगी। दिसंबर 1991 में पटना के राष्ट्रीय अधिवेशन में दोनों ग्रूपो में गाली गलौज इतनी ज्यादा हुई, लेकिन मार पीट होते होते बच गई। उसी अधिवेशन  में खापर्डे, मेश्राम,और बोरकर जी की तिकड़ी ने  झल्ली जी को बामसेफ से निकाल दिया और अपने ग्रूप के बामसेफ का अध्यक्ष खुद न बनकर, साफ छवि दिखाने के लिए यस यफ गंगावणे को अध्यक्ष बना दिया। रजिस्टर बामसेफ की पात्रता तो झल्ली साहब के पास थी तो उन्होंने अपनी बामसेफ चालू रखी। इस तरह गंगावणे जी की तीसरी अनरजिस्टर्ड बामसेफ हो गई।
  15)-  सभी बामसेफी मंडली अपनी -अपनी डफली बजाती रही, पैसा इकट्ठा करती रही, सालाना अधिवेशन भी होता रहा, असली और सही मिशन से भटक कर, सिर्फ अपनी स्वार्थसिद्धि होती रही। गंगावणे जी बामसेफ को सफल बनाने के लिए काफी मेहनत किए। नकारात्मक भावनाएं कैडर में आ जाने से मुस्किल हो रहा था, फिर भी प्रमोशन की परवाह न करते हुए, फुल टाइम काम करने के लिए सन् 1995 में नौकरी तक भी छोड़ दी। मिशन पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। इधर खापर्डे जी बिना किसी पद के हतोत्साहित हो रहें थे। इतने लम्बे समय से काम करने के कारण महत्त्वाकांक्षा बढ़ रही थी और गंगावणे जी के साथ ईगो टकरा रहा था।
 16)- दिसंबर 1996 में मुम्बई के चूना भट्टी मैदान के अधिवेशन में यस यफ गंगावणे जी को हटाकर, खापर्डे जी खुद अध्यक्ष बन गये। उधर गंगावणे जी भी फुलटाइमर होने के कारण अपनी बामसेफ चालू रखी। 
   17)- कांशीराम जी के बामसेफ से सम्बन्धित होते हुए भी मैं इस अधिवेशन में कुछ जानकारी लेने के लिए दो दिन सम्मिलित हुआ। देखा और अनुभव किया कि करीब- करीब 200-250 परिवार बीबी-बच्चो के साथ तीन दिन के अधिवेशन में सामिल होने और मुम्बई घूमने के मूड में आए हुए हैं। कुछ लोगों से बातचीत से यह भी मालूम पड़ा कि ए लोग मान्यवर कांशीराम के बामसेफ के लिए ही काम करते हैं। मैंने उत्सुकतावश कुछ सवाल भी पूछे थे कि स्टेज से तथा वक्ताओं के भाषणों से कांशीराम और बहन मायावती जी की कही कोई चर्चा नहीं हो रही है। जबाब था हमलोगो को राजनीति से दूर रहना हैं।
  18)-2002 में खापर्डे जी की मृत्यु हो गई, स्वाभाविक है, बामन मेश्राम जी ने अध्यक्षता ले ली!
  19)- 2003 में बामन मेश्राम के ऊपर चरित्रहीन होने का एलिगेशन लगा। बामसेफ के चरित्र को साफ़ सुथरा बनाने के लिए बी डी बोरकर जी ने बामन मेश्राम जी को बामसेफ से निकाल दिया और खुद अध्यक्ष बन गये। बामन मेश्राम जी भी नौकरी छोड़कर  फुल टाइमर इसी पर डिपेंड थे, तो बामसेफ कैसे छोड़ते? यहां फिर दो अनरजिस्टर्ड बामसेफ एक बामन मेश्राम जी कीऔर दूसरी बोरकर जी की हो गई।
20)- दोनों अपना सालाना अधिवेशन अलग-अलग करते रहे। बामन मेश्राम जी ने 2012 में एक अपनी पोलिटिकल पार्टी बना लिया। कांशीराम जी को इसी मुद्दे पर आलोचना करने वाले बामसफी, अब बोरकर जी भी कैसे पीछे रहते। कुछ भी हो प्रशासनिक अधिकारी थे, इन्होंने भी सन् 2018 में अपनी पोलिटिकल पार्टी बना ली।
  21)- कांशीराम जी की बामसेफियों का महत्त्व धीरे धीरे उसी दिन से कम होने लगा , जब ब्राह्मणों के साथ सोसल इंजीनियरिंग करते हुए फुल मिजारिटी की सरकार बन गई और हम लोगों का 200-400 रुपया महीना देना पार्टी की तौहीनी होने लगी। सुना है अभी भी कुछ लोग अपने फायदे के लिए जिन्दा रखे हुए हैं।
  22)- अभी दिसंबर 2019 में औरंगाबाद में एक बामसेफ के अधिवेशन में गेस्ट वक्ता के रूप में सम्मिलित होने का मौका मिला। वहां, अध्यक्ष अतरबीर सिंह से ही बातचीत से पता चला कि असली और प्रामाणिक बामसेफ सर्टिफिकेट के साथ,  उन्ही के पास है। वहां के अधिवेशन का भी सेम पैटर्न, परिवार के साथ खुशी का माहौल, । पांच दिन तक पूरे परिवार को, स्टैन्डर्ड क्वालिटी का रहने का प्रबंध, उठते ही सुबह की चाय, सुबह का नास्ता, दोपहर का खाना,  रात का खाना, फिर रात को इंटरटेनमेंट, बीच में कहीं भी घुमने की आजादी। अब तो यह हालत है कि सालाना अधिवेशन परिवार के लिए मजबूरी हो गया है, मिशन के लिए ज़रूरी नहीं। मैं अपना गेस्ट भाषण दिया, लेकिन 10-15 कोर कमेटी के सीनियर अधिकारियों के साथ ग्रूप मीटिंग में पूरी बात समझाते हुए असंतोष भी जाहिर किया था। एक महोदय का कहना था कि, हमी लोगो के कारण समाज मे परिवर्तन आ रहा है। मैंने कहा हम लोगों का यही योगदान है कि वे लोग 2 M P से 300 हो गये और हम लोग आज कहां हैं?
  22)- झल्ली साहब जो अभी" पैगाम" चला रहे हैं, औरंगाबाद अधिवेशन में सम्मिलित होने की जानकारी होने पर, उनके एक खास साथी ने मुझसे कहा कि ओरिजनल बामसेफ अभी भी हम लोगो के पास ही है। कोई धोखेबाजी से बना लिया है और गलत दावा कर रहा है।
  पता नहीं ऐसे कितने बामसेफ संघठन पूरे देश में चल रहे हैं?
   साथियों, बामसेफ के माध्यम से मान्यवर कांशीराम जी ने समाज को रिटर्न में कुछ पोलिटिकल चेतना और पावर दिया, लेकिन आप सभी लोग मिलकर लगभग 40 सालों में समाज को क्या रिटर्न दिया। शुरुआती दौर में मिशन के दो ही नायक थे, जिसे फुले- अम्बेडकरी मिशन भी कहा जाता था। कांशीराम जी ने भी आगे चलकर दो नाम और जोड़े, शाहूजी और पेरियार जी। लेकिन आप लोगों ने सभी जातियों को खुश करने के लिए इतने नायक बनाए कि, हैंडबिल में दो लाइन भी कम पड़ जाती है और उसी में फुले अंबेडकर को ढूंढना पड़ता है। जातियों को बढ़ावा भी ब्राह्मणवाद ही है।
 आप लोग आपस में ही टूटते गये और सभी कांशीराम बनने की होड़ में सेम पैटर्न की कापी करते गये। अलग तरह से हटकर कुछ अलग नया करने की किसी ने नहीं सोची। कोई दावा करता है, लाखों करोड़ों सदस्यता होने की। इतने करोड़ों मंथली इनकम से आप चाहते तो, बंचित समाज के लिए मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेज, छोटी छोटी स्माल स्केल इंडस्ट्रीज, हास्टल आदि सुचारू रूप से चलाया जा सकता था। मुझे लगता है नकारात्मक सोच के कारण सिर्फ एक ही मुद्दा बहुजन का बिरोध में मूलनिवासी बन गये और ऊपर से एक ही मुद्दा ब्राह्मण विदेशी कहते रहे? आप कौन से संवैधानिक अधिकार के अंतर्गत ब्राह्मण को विदेशी कहकर भविष्य में कभी सफल हो सकते हैं? आज नौबत ए आ गई है कि मनुवादी हमारे ही करीब 20% आदिवासी,और घुमक्कण जातियों को विदेशी बना कर वोट से वंचित करने पर उतारू हो गए हैं।
    दूसरी बात बामसेफ ने संविधान का हवाला देते हुए कि सभी को पूजा पाठ,आस्था का अधिकार है।  हिन्दू धर्म के पाखंड, भगवान, देवी देवता, ऊंच-नीच मान्यता, आस्था आदि, जो हमारे समाज की दयनीय स्थिति के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है, उस पर आप लोगों ने प्रैक्टिकल रूप में जोरदार अटैक कभी भी नहीं किया। इस विषय पर मेरी कयी बार बहस भी हो चुकी है। आप लोगों का मानना है कि लोग अपने आप छोड़ देंगे, टोटली फेल्योर अवधारणा है।
   चलिए आज से पैसा फिलहाल देने की जरूरत नहीं है। पहले पवित्र मूलनिवासी बामसेफी बनिए। अपने घर को हिन्दू धर्म की पाखंडी मान्यताओं के कचरों को बाहर फेंकते हुए, फिनायल से इतना साफ करिए कि पाखंडी वायरस की कही बदबू  न आए। इसके बाद सिर्फ बाबा साहेब की एक फोटो लगा लीजिए। अपने आप को किसी भी तरह से पाखंडियों से उच्च होने का हर समय एहसास करतें रहिए और ऐसे लोगों की घर में टोटली इन्ट्री बन्द कीजिए। 100-200 साल पहले की अपने बाप दादाओं के अपमान को दिमाग के पटल पर रखते हुए , वैसा ही सोसल और सामाजिक बहिष्कार कीजिए और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित कीजिए। आप के पास इस समय इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखाई दे रहा है। मानसिकता बदलिए, परिवर्तन अपने आप में करिए, फिर अनुभव कीजिए थोड़ी थोड़ी सफलता की अनुभूति अपने आप महसूस होने लगेगी। धन्यवाद!
  गर्व से कहो हम शूद्र हैं।
  आप के समान दर्द का हमदर्द साथी
  शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
   मो०-7756816035


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