गर्व से कहो हम शूद्र हैं

🔥नौवां एपिसोड,सुबह,दिनांक 21-04-2020🔥
🔥बौद्ध समाज के कुछ प्रश्न & उनके उत्तर🔥
   कुछ लोगों को मुझसे शिकायत रहती है कि, "गर्व से कहो हम शूद्र हैं" मिशन से, आप हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। कुछ लोग तो RSS का दलाल तक भी कह देते हैं। आजकल सामाजिक दलालों की परिस्थितियों को देखते हुए कुछ हद तक आप के सोचने का नजरिया भी सही हो सकता है, इसमें आप का दोष नहीं है। इसके एक कारण और है, आजतक, हिन्दू वर्ण व्यवस्था के चार वर्णों में सिर्फ, ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य के अलावा, जो मूख्य वर्ण शूद्र था, कलंकित किए जाने और खुद समझने के कारण, उसका नाम लेने वाला ही कोई नहीं था। ऊंच-नीच की सीढ़ी नुमा, 6000 जातियों में बटे, एक दूसरे से उच्च और गौरवान्वित महसूस करने में दिन रात लगे हुए हैं। यहां तक कि, जब कभी मौका मिलता है तो, बौद्ध धर्म वाले भी अपनी जाति महार की महिमा मंडित करने लगते हैं। विचित्र मानसिकता है, ब्राह्मणों द्वारा दिए गए, अपने अपने नाम और जाति पर सभी गर्व करते हैं, लेकिन उसी के बाप शूद्र से नफ़रत करते हैं। आप खुद आंकलन कीजिए, जाति या शूद्र में, कौन ब्राह्मण वर्ण से टक्कर ले सकता है।
   सिर्फ धर्म परिवर्तन करने से, ब्राह्मणी वायरस रूपी बिमारी से निजात नहीं मिल सकता है। हिन्दू धर्म की बुराइयों को पहले पहचानिए, समझिए, उसे पहले अपने दिलों दिमाग से निकालिए, शुद्ध हो जाइए, इसके बाद ही परिवर्तन की सोचिए।हां एक बात और है कि,आप गौतमबुद्ध को भगवान मत बनाइए, अन्यथा, आप सोचते हैं कि हिन्दू धर्म के भगवानों को छोड़कर, बौद्ध भगवान की पूजा अर्चना और बदले में फल प्राप्ति मिलेगी, तो आप की बहुत बड़ी भूल है और आप कभी भी ऐसी सोच रखकर भारत को बौद्धमय नहीं बना सकते हैं। बड़ी जद्दोजहद और ज्ञान हासिल करने के बाद, वैज्ञानिक सोच की प्रवित्ती वाला इन्सान, एक भगवान छोड़कर दूसरे भगवान की शरण में क्यों जायेगा? यदि ऐसा करता है तो वह, कहीं न कहीं हिन्दू धर्म की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है और बौद्ध होने का ढोंग कर रहा है।
  आजतक जितने लोगों ने हिन्दू धर्म की असमानता क्रूरता छूआछूत जैसी बिमारियों से निजात पाने के लिए धर्म परिवर्तन किया है, उन सभी में कम या ज्यादा ए सभी बुराइयां विद्यमान है।    
    अभी सिर्फ 300 साल पहले प्रगतिशील सिक्ख धर्म बना है, उसमें में ए बुराइयां कभी कभी चमड़ी से बाहर निकल कर अपना रंग दिखाने लगती है।
   अनुभव से एक दो उदाहरण देना उचित समझता हूं।
   एक बार मैं 1989 में, कांदिवली के लहूगढ़ में मातंग समाज का प्रशिक्षण ले रहा था। एक सज्जन का बहुत ही मार्मिक सवाल था। सर जी, मैं बौद्ध धर्म अपना लिया हूं, मेरी तीन बेटियां शादी के लायक हो गई है, मेरी बेटियों से न मातंग (हिन्दू) और न ही महार (बौद्ध) शादी करने को तैयार हैं।
  हमारे एक साथी उत्तर प्रदेश से चमार जाति के, सेवानिवृत्त मंडल अभियंता मुम्बई में महार बौद्ध से शादी कर लिए थे। उनकी लड़कियां योज्ञ होने के वावजूद शादी में बहुत ही कठिनाई का सामना करना पड़ा था।
  महाराष्ट्र का बाबा साहेब के जमाने से बौद्ध धर्म ग्रहण करने वाले आज भी अपनी जाति और सर नेम छोड़ने को तैयार नहीं है, जब कि उत्तर भारत में लोग बिना धर्म परिवर्तन किए ही अपना सर नेम बदल रहे हैं।
  हमारी बिल्डिंग में बाबा साहेब के साथ धर्म परिवर्तन करने वाला एक कांबले परिवार रहता है। वह हर साल अपने घर में गणपति बप्पा की मूर्ति स्थापित करता है। एक दो बार टोकने पर बुरा मान गया और प्रतिक्रिया में कहा कि, अंकल आप जानते हुए भी हर बार टोकते है। कारण जानने की जिज्ञासा बढ़ी और आप को जानकर हैरानी होगी। उनकी औरतों का कहना है कि इतने दिनों तक भगवान गौतम बुद्ध की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं, आजतक कोई अच्छा फल प्राप्त नहीं हुआ।
   साथियों, हमारा दिमाग की मेमोरी भी सीडी या कैसेट की तरह ही होती है। पुराने मैसेज को डिलीट करने के बाद ही नया मैसेज लोड किया जा सकता है। हमारे मिशन का भी मूख्य उद्देश्य यही है। पहले हिन्दू धर्म की बुराइयों को डिलीट करो फिर अंबेडकरी और गौतमबुद्ध के विचारों को लोड करो।
   पहले शिक्षा, बाद में दीक्षा। यदि सही शिक्षा मिल गई तो दीक्षा की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। धन्यवाद! जय भीम! जय भारत!
  आप के समान दर्द का हमदर्द साथी!
    गर्व से कहो हम शूद्र हैं!
  शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
  मो०-W-7756816035
              9869075576


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