हरिशंकर परसाई, 13 अप्रैल 1986

🔥हरिशंकर परसाई, 13 अप्रैल 1986🔥
"बाकि बातें छोड़िये । युवक क्या कर सकते हैं, यह समझिये । युवक पहले स्वयं शिक्षित हों फिर लोगों को शिक्षित करें । शिक्षा से मतलब उस शिक्षा से नहीं है जो दी जा रही है । सही शिक्षा । इतिहास की सही समझ होनी चाहियें । मध्ययुग के इतिहास की ग़लत समझ सांप्रदायिक द्वेष का मूल कारण है । यह इतिहास मुझे भी ग़लत पढ़ाया गया था और आप युवकों को भी ग़लत पढ़ाया जाता है । मुसलमान भारत में लूटपाट करने या राज्य जीतने के लिए आते थे । इस्लाम का नाम वे उत्तेजित करने के लिए लेते थे । मेहमूद ग़ज़नवी सोमनाथ का खजाना लूटने आया था, इस्लाम के लिए नहीं । उसकी सेना में हिन्दू बहुत थे । रास्ता बतलाने वाले भी हिन्दू थे । जितने हमलावर आये, उन सबकी सेना में बहुत से सिपाही भारत में भर्ती होते थे । सिपाही अच्छी नौकरी करना चाहते थे, चाहे वह हिन्दू राजा की हो या मुसलमान राजा की । शिवाजी के सेनाध्यक्ष मुसलमान थे और प्रतापसिंह के हिन्दू । अकबर के सेनापति मानसिंह थे और औरंगजेब के सेनापति जयसिंह । बाबर की पानीपत में लड़ाई इब्राहिम लोदी से हुई जो मुसलमान था । राज्य और पैसे के मामले में ना मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई थे, ना हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई । औरंगजेब की ज़्यादा लड़ाई मुसलमानों से हुई थी ।
पहले जो आये वे लुटेरे थे । मुग़ल यहाँ रहने आये थे । बाबर लौटकर वतन नहीं गया । मुग़ल लोगों की सभ्यता और संस्कृति उन्नत थी । इन्हें शकों और हूणों जैसी बर्बर जातियों की तरह भारतीय समाज पचा नहीं सकता था । ये ताजमहल बनाने वाले लोग थे । इनके साथ संस्कृति का समन्वय ही हो सकता था और वह हुआ ।
हिन्दू से मुसलमान तलवार की धार से नहीं बने । कारीगर मुसलमान बने और नीची जाति के लोग स्वेच्छा से बने । वे हिन्दू समाज में अछूत थे, अपमानित होते थे और अत्याचार के शिकार थे । उन्हें इस्लाम में बराबरी का दर्जा मिला । बहुदेववाद से छूटकर एकेश्वरवाद मिला ।
मंदिर लूटने का मुहकमा मुसलमान राजाओं के यहाँ नहीं था । हिन्दू राजाओं के शासन में बाकायदा मंदिर लूटने का मुहकमा था । यह रिकॉर्ड है । मंदिर धर्म के कारण नहीं, धन के कारण लूटे जाते थे । सबसे ज़्यादा मंदिर राजा हर्ष ने लूटे । मुसलमान राजा भी मंदिर धन के लिए ही लूटते थे पर औरंगज़ेब काशी के विश्वनाथ मंदिर तथा उज्जैन के महाकाल मंदिर को धन देता था ।
मध्ययुग के काव्य में कहीं हिन्दू-मुस्लिम द्वेष नहीं है, समन्वय है । मुसलमान कवियों ने कृष्ण पर काव्य लिखा है । कबीरदास ने हिन्दू-मुसलमान दोनों को ही पाखण्ड के लिए लताड़ा है पर यह नहीं कहा कि तुम भाई-भाई हो और आपस में मत लड़ो । इसकी ज़रुरत ही नहीं थी ।
विस्तार से लिखा नहीं जा सकता । मेरा मतलब इतिहास को ठीक से पढ़ें, समझें । जाति प्रथा ख़त्म करें । मंदिर और मस्जिद के लिए न लड़ें । सांप्रदायिक राजनीति के चक्कर में ना आएँ । द्वेष को ख़त्म करें । युवक जनता को शिक्षित करें"