हिन्दू धर्म बहुत पुराना है, इसलिए उच्च कोटि का है, मेरा ज़बाब!🔥

🔥हिन्दू धर्म बहुत पुराना है, इसलिए उच्च कोटि का है, मेरा ज़बाब!🔥
    यह शाक्षो से और मानव के विकास की जरूरतों के लिए रिसर्च से ही विदित है कि जो जितना पुराना वह उतना ही कचरा, जंगली प्रवित्ति, अमानवीय व्यवहार से भरा था। 
   यह प्रवित्ति कुछ असहज नहीं, सत्य और मानवीय गुणों पर आधारित है।
   प्रकृति ने ही इंसान में विवेकीय गुण होने के कारण, बचपन से ही तीन अवगुणों को दिमाग में भर दिया है और यह वैज्ञानिकों द्वारा रिसर्च में सत्य भी पाया गया है।
     "लालची, स्वार्थी और कामचोर।
  कुछ इसपर भी बहस कर देंगे, इसलिए ऐसे कुछ नादान लोगों को समझाना भी पड़ेगा।
  आप अपने घर में ही सत्य साबित कीजिए।
  1)- लालची-- 5-6 साल के बच्चे को तरह तरह के  पेट भर खाने से ज्यादा मिठाई दे दीजिए। खूब भर पेट खा लेगा, अब खाएगा तो मरेगा, लेकिन ठीक उसी समय कोई अपरिचित हमजोली बच्चा यदि उस मिठाई को लेना चाहेगा तो , वह नहीं लेने देगा, प्रोटेस्ट करेगा, चिल्लाएगा। इसको उस बच्चे में कौन सा अवगुण कहेंगे?   "लालची" प्रवित्ति।
   2)- स्वार्थी- इसी तरह बहुत से, उसकी कैपेसिटी से ज्यादा, तरह तरह के खिलौने दे दीजिए। खेल कर थक जायेगा, यदि ठीक उसी समय, कोई अपरिचित बच्चा लेने की कोशिश करेगा, क्या वह?  कोई एक खराब से खराब खिलौना आगे बढ़कर उसे देगा? नहीं। इसे कहते हैं, "स्वार्थी" प्रवित्ति।
  3)-कामचोर- आप अपने हाल या पैसेज के रास्ते में एक तौलिया या रुमाल जमीन पर रख दे और 10-12 साल के बच्चे को बुलाए, वह उसी रास्ते से यहां तक कि उस पर पैर रखते हुए चला जाएगा, लेकिन जबतक आप कहेंगे नहीं तबतक अपने आप से वह उस तौलिया को नहीं उठाएगा। "कामचोर" प्रवित्ति।
 यही तीनों अवगुण बचपन से डबलप् होते हुए बुढ़ापे तक अपना रंग दिखाता है। यह अवगुण जानवरों में नहीं पाया जाता है।
    इन्ही तीनों अवगुणों से मुक्ति दिलाने के लिए, पहले मां बाप बच्चों को घर में शिक्षा देते हैं और फिर स्कूलों कालेजों में भी इन अवगुणों से मुक्ति दिलाने के लिए शिक्षा की जरूरत होती है।
  आप ध्यान दीजिए, दूनिया भर के जितने अपराध है, सब इन्ही तीन अवगुणों के कारण है और जो इन अवगुणों से जिस अनुपात में मुक्ति पा गया, वह उसी अनुपात में महान बन गया। सिर्फ मानव को सुधारने के लिए आज के आधुनिक युग में भी, ग्राम पंचायत, पोलिश, कोर्ट-कचहरी आदि बनाए गए हैं।
 अब मैं उन नादान हिन्दुओं के लिए, जिस धर्म में, लाख अमानवीय व्यवहार होने के बावजूद भी, उसको सबसे प्राचीन होने पर गर्व करते हैं, समझाना ज़रूरी समझता हूं।
   समझते समय मानवीय तीन अवगुणों को बराबर दिमाग में रखना, तभी सही आंकलन होगा, अन्यथा आप का ईगो सामने आ जाएगा।
    जब कपड़े का आविष्कार नहीं था तो, हिन्दू नंगें धड़ंगे रहते थे, आपसी कोई मां बाप, बेटी बहन, पति-पत्नी का रिश्ता नहीं होता था, शादी विवाह या लभ मैरिज का रिवाज नहीं था, जिसकी लाठी उसकी भैंस का रिवाज था। जानवरों की तरह ही लोग सेक्स करते थे। क्या यही उच्च कोटि है?
 ज्यादा जानकारी के लिए राहुल सांकृत्यायन की लिखी किताब "गंगा से वोल्गा तक" पढ़ लीजिएगा।
 आग की खोज जब नहीं थी, तब जिन्दा रहने के लिए कुछ भी खाते थे यहा तक कि बिना भुने जानवरों तक का खाने का प्रमाण मिलता है।
 स्वार्थी, लालची प्रवित्ति के कारण, एक दूसरे को सताना, लूटना, अत्याचार और दूसरों को गुलाम बनाना आम बात थी। दो हजार साल पुरानी बात छोड़िए, हजार सालों के अंदर, बेटा मां बाप तक को मारकर अपने स्वार्थों को पूरा करते थे। जिसे हम लोग राजशाही शासन कहते थे। जिसे पूरे विश्व में लात मारकर, आधुनिक वैज्ञानिक युग में लोकतंत्र लाया गया।
   जो ताकतवर हो गया वह अपने स्वार्थ के अनुसार आगे चलकर अत्याचार, शोषण और गुलाम बनाकर, दूसरे की कमाई पर अपना हक जमाने के लिए, नियम कानून बनाने लगे, इसी नियम कानून की पुस्तकों को बेद पुरान, मनु-स्मृति, रामायण-महाभारत आदि नाम दिया गया। उसे बाद में चलकर धर्म नाम दें दिया गया। क्या, कहीं भी, किसी भी समय में किसी भी पुस्तक में हिन्दू धर्म लिखा है। जब नहीं लिखा है तब उन पुस्तकों को धार्मिक पुस्तक क्यो कहते हैं? 
  आज भी यदि एक सवाल, किसी भी हिन्दू भाई से पूछिए? 
    आप हिन्दू धर्म में क्यों हो? और इसका पालन कैसे करते हो? किसी से भी, यहां तक कि धर्म के ठेकेदारों से भी, एक और एक समान उत्तर पाना नामुमकिन है।
  लेकिन जब वही सवाल, किसी भी मुस्लिम से पूछिए, उत्तर होगा।
  मुझे मोहम्मद पैगंबर में विश्वास है और उनके बताए रास्ते, कुरान के अनुसार अपना जीवन यापन करता हूं।
  ईसाई कहेगा, ईसा मसीह में विश्वास और उनके बताए मार्ग वायबिल का अनुसरण करता हूं।
  इसी तरह हर एक धर्म का एक धर्म गुरु , एक धार्मिक पुस्तक और सभी धर्मावलम्बीयों पर समता और समानता से लागू होती हैं। वही गर्व करने वाले हिन्दुओं का क्या है?
     क्या यही उच्च कोटि है?
   ज्यादा लिखना भी मैं उचित नहीं समझता हूं। क्योंकि , कितना भी समझाओगे? अपने लवेदी भाषा पर कुछ लोग तो आ ही जाते हैं। 
   शारंस यही है कि, जो धर्म जितना पुराना, उतना ही क्रूर और अमानवीय था, है और रहेगा। इसलिए उसे सुधारना ही बेहतर होगा। अन्यथा लात --
   उदाहरण के लिए सबसे नया सिर्फ 300 साल पुराना भारत में सिक्ख धर्म है, क्या आप ने कभी भिखारी सिक्ख देखा है?
  शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
   मो०-7756816035