लकीर के फकीर*   *मत  बनो जमीर।*    *परख स्वंय दर्पण,*     *बदल तकदीर*

[4/21, 12:54] Cid Amar Singh Bhopal: *लकीर के फकीर*
  *मत  बनो जमीर।*
   *परख स्वंय दर्पण,*
    *बदल तकदीर*
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अंधविश्वासी पाखंडवादी समाज लकीर के फकीर बन कर मनूवादियों के पीछे पिछलगू बनकर चापलूसी करना गुलामों की नीति है, बहुजन अपना अमोल समय बर्वाद कर निर्णायक भूमिका क्यों नहीं निभा रहा है।
      गुलाम गीरी सीमा की हद होती है मुर्ख की सीमा की शुरूवात अंधविश्वास पाखंडवाद से होती है और पढा लिखा समाज का दाउत्व बनता है कि हम खुल कर पाखंडियों का विरोध कर सत्य शोधक समाज की स्थापना करें और अज्ञानता को दूर करें।
       शासन सत्ता मैं बैठे सामंत वादी शोषण कर्ता शोषण के पोषक हैं और शोषितों का शोषण करते रहेंगे। यह प्रकृति का नियम है बडी मछली छोटे का अहार करती आई है,जीव जीव का अहार है। मैं विश्वास जीवों में मानव श्रेष्ठ है यह सत्य है  हमारी मानवीय दृष्टि होना चाहिए और सत्ता में बैठे गद्दारो को जाग्रत बहुजन समाज को एक होकर भारतीय संविधान न्याय हित में अस्प्रृश्यता की जंग विवस्था परिवर्तन मैं भागीदारी खुल कर निडर निर्भीक निशंक होकर लेना चाहिए लकीर के फकीर बनकर काम नहीं चलेगा।अस्प्रृश्यता दूर करना ही आपके जीवन का मेंन लक्ष्य है और स्वाभिमान सममान की जिंदगी जीना और मानव समाज का कल्याण करना यही आपके जीवन का सार है।
     जिनका स्वाभिमान मरा है वे जीते जी मुर्दा हैं।
जय भारत,
🇮🇳जय संविधान🇮🇳।
जागो मूलनिवासी।
बोल पच्चासी।
     *अमर सिंह*
        *SI*
*CID,MP,BPL*
[4/21, 21:26] Cid Amar Singh Bhopal: *दोगली नीति*
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राजनीति ✌️दोगली नीति नहीं होनी चाहिए, दोगली नीति से लोकतंत्र की हत्या होती है। लोकतंत्र की परिभाषा है जनता की जनता द्वारा जनता के लिए लेकिन एेसा नहीं है वर्तमान में  कुवेर तंत्र ,लूट तंत्र,और फूट तंत्र,सामंत वादी तंत्र हावी है लोकतंत्र तो है ही नहीं।
     *EVM की लूट है,*
    *लोकतंत्र की हत्या।*
*कुवेर तंत्र से बने,*
*चोरों की सत्ता।*
सामंतवादियों को छूट है, गुलाम बनाने की सडयंत्र कारी नीति निरधारित कर अपना उल्लू सीधा करना यही ✌️दोगली नीति है।
जागो मूलनिवासी।
    अमर सिंह


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गर्व से कहो हम शूद्र हैं
देश के अन्दर क्या परम्परा चल रही है जाने
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धर्मिक स्त्रियां धर्म के इन आदेशो को कितना सही मानती हैं ? आज भी समाज में विधवा स्त्री का बहुत ज्यादा सम्मान नहीं होता है ,अधिकतर विधवा स्त्री को अपशकुन ही समझा जाता है ।आप वृन्दावन सहित देश के बहुत से हिस्सों में विधवाओ के लिए बने आश्रमो में देख सकते हैं की उनकी क्या दुर्दशा होती है । इस बार वृंदावन में विधवाओ ने सैकड़ो साल की कुरीति तोड़ते हुए होली मनाई । अंग्रेजो के आने से पहले सती प्रथा समाज में कितनी प्रचलित थी यह बताने की जरुरत नहीं है , समाज में विधवा स्त्रियों को जला के उन्हें देवी मान लिया जाता था । समाज में विधवाओ के प्रति यह क्रूरता आई कैसे ?कौन था विधवाओं की दुर्दशा का जिम्मेदार ?जानते हैं - महाभारत के आदिपर्व में उल्लेख है की जिस प्रकार धरती पर पड़े हुए मांस के टुकड़े पर पक्षी टूट पड़ते है , उसी प्रकार पतिहीन स्त्री पर पुरुष टूट पड़ते हैं । स्कन्द पुराण के काशी खंड के चौथे अध्याय में कहा गया है "विधवा द्वारा अपने बालो को संवार कर बाँधने पर पति बंधन में पड़ जाता है अत:विधवा को अपना सर मुंडित रखना चाहिए। उसे दिन में एक बार ही खाना चाहिए वह भी काँसे के पात्र में , या मास भर उपवास रखना चाहिए । जो स्त्री पलंग पर सोती है वह अपने पति को नर्क डालती है , विधवा को अपना शरीर सुगंध लेप साफ़ नही करना चाहिये और न ही श्रंगार करना चाहिए । उसे मरते समय भी बैलगाड़ी पर नहीं बैठना चाहिए , उसे कोई भी आभूषण तथा कंचुकी नहीं पहननी चाहिए कुश चटाई पर सोना चाहिए और सदैव श्वेत वस्त्र पहनने चाहिए ।उसे वैशाख , कार्तिक और माघ मास में विशेष व्रत रखने चाहिए । उसे किसी शुभ कार्य में हिस्सा नहीं लेना चाहिए और हमेशा हरी का नाम जपना चाहिए । विधवा का आशीर्वाद विद्वजन ग्रहण नहीं करते मानो वह कोई सर्प विष हो । विधवाओं के प्रति यह आदेश धर्म का है , आज भी स्त्रियां ही सबसे अधिक धर्मिक प्रवृति की होती हैं ...यदि स्त्रियां धर्म का साथ छोड़ दें तो धर्म नाम की दुकान एक दिन में बंद हो जायेगी । तो आज की धर्मिक स्त्रियां, विधवाओं के प्रति धर्म के इन आदेशो को कितना सही मानती हैं ? - केशव (सजंय)..
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