विवाह होने का एक रूप ऐसा भी हो

जैसे ही वरमाला के कार्यक्रम के पश्चात दूल्हे ने दुल्हन के पाँवो को छुआ तो सब हँसने लगे।
यह क्या कर रहे हो?
दूल्हे ने कहा बिल्कुल सही कर रहा हूँ।
आज से यह मेरी पत्नी ही नहीं मेरे घर परिवार की नींव है। इसके व्यवहार से ही समाज में मेरी पहचान बनेगी,
इसके हाथों ही मेरे माँ बाप को मान सम्मान मिलेगा,
मेरी आने वाली पीढ़ी इसके ही खून पसीने से सींची जाएगी।
मेरा पूरा जीवन अब इसके ही साथ जुड़ गया है तो मुझे इसकी इज्जत करनी चाहिए न कि इसे मेरी।
दूल्हे की बात सुनकर सब लोग तालियां बजाने लगे और एक नई परंपरा और सोच का जन्म हो गया।
नई सोच नई पहल और यह सच भी है इसको हर मर्द को मानना चाहिए कि पत्नी से ही बढ़ती समाज में उसकी शान...


धन निरंकार जी!