▪ 1860 में प्राचीनता तलाशने के लिए मथुरा में खोदाई शुरू की गई, तो अलग-अलग स्थानों पर बुद्ध की करीब पांच हजार प्रतिमाएं मिलीं ।

▪ 1860 में प्राचीनता तलाशने के लिए मथुरा में खोदाई शुरू की गई, तो अलग-अलग स्थानों पर बुद्ध की करीब पांच हजार प्रतिमाएं मिलीं ।


▪ पूरी दुनिया को अहिंसा का संदेश देने वाले बुद्ध का मथुरा से भी गहरा नाता रहा है। यहां के जर्रे-जर्रे में बुद्ध का इतिहास छिपा है, तो कण- कण इसका गवाह है। खोदाई में प्रतिमाएं निकलीं तो देश-दुनिया के पर्यटक भी शोध को आने लगे। हजारों वर्ष पुरानी ये प्रतिमाएं भी मथुरा के संग्रहालय की शान हैं।


▪ मथुरा से बुद्ध का गहरा नाता है। वह अपने निर्वाण से कुछ साल पहले ही मथुरा आए थे। यहां उन्होंने अहिंसा का संदेश भी दिया था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बुद्ध ने मथुरा में भ्रमण किया। भगवान बुद्ध की यात्रा का उल्लेख संग्रहालय के पूर्व निदेशक स्वर्गीय रमेश चंद्र शर्मा की लिखित पुस्तक मथुरा संग्रहालय परिचय में भी मिलता है। पुस्तक में बताया गया कि महात्मा बुद्ध ने काफी पहले मथुरा की यात्रा की थी, पहली यात्रा से वह संतुष्ट नहीं थे, लेकिन परिनिर्वाण से कुछ दिन पहले की गई यात्रा में उन्होंने मथुरा के संबंध में कई बातें कहीं । उस समय तत्कालीन शासक अवंतिपुत्र ने काफी आदर सत्कार किया। 1860 में प्राचीनता तलाशने के लिए मथुरा में खोदाई शुरू की गई, तो अलग-अलग स्थानों पर महात्मा बुद्ध की करीब पांच हजार प्रतिमाएं मिलीं। मथुरा संग्रहालय के पूर्व वीथिका सहायक शत्रुघ्न शर्मा बताते हैं कि ये सभी प्रतिमाएं मथुरा में ही बनी थीं। कोरिया, चीन, ऑस्ट्रेलिया की मूर्ति प्रदर्शनी में भी यहां से मूर्तियां गईं।


▪ खोदाई में जमालपुर टीला से मिली भगवान बुद्ध की प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला का सबसे बेहतरीन उदाहरण मानी जाती हैं। कमल के समान नेत्र, सुंदर घुंघराले बाल, लंबे कान, चारों दिशाओं में ज्ञान के प्रकाश की किरण मूर्ति को नयनाभिराम बनाती हैं। मूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है ध्यानभाव। शत्रुघ्न शर्मा बताते हैं कि भगवान बुद्ध की पहली प्रतिमा भी मथुरा में बनी है। यह मूर्ति खोदाई में कटरा केशवदेव से मिली थी।


▪ सन् 1860 में कटरा केशवदेव टीला की खोदाई शुरू हुई। यह खुदाई एएसआइ के तत्कालीन निदशक अलेक्जेंडर कनिंघम ने शुरू कराई थी। उनकी धार्मिक ग्रंथों में भी रुचि थी। कटरा केशवदेव की खोदाई पांच साल चली। कंकाली टीला की खोदाई 1888 से शुरू होकर चार वर्ष चलती रही। इसी तरह समय-समय पर भूतेश्वर और अन्य टीलों की खोदाई हुईं। सबसे अंत में सौंख टीला की खोदाई 1962 में हुई। यह खोदाई छह वर्ष तक यानी 1968 तक हुई। इन खोदाई में सबसे ज्यादा मूर्तियां बुद्ध की ही मिलीं। इसके अलाव जैन धर्म, नाग, अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी इन खोदाई में मिलीं। आज भी मथुरा संग्रहालय में करीब पांच हजार मूर्तियां रखी हैं, 33 फीसद सैलानियों के दर्शन को हैं, बाकी गोदाम में रखी हैं।


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