आंध्रप्रदेश के पांचवीं अनुसूची प्रकरण पर संविधान पीठ फैसले की पहली प्रामाणिक कानूनी व्याख्या। अनर्गल चर्चा छोड़ कर आदिवासी हित में सभी सगाजन इसको पढ़े, समझे और सवाल करे।

आंध्रप्रदेश के पांचवीं अनुसूची प्रकरण पर संविधान पीठ फैसले की पहली प्रामाणिक कानूनी व्याख्या। अनर्गल चर्चा छोड़ कर आदिवासी हित में सभी सगाजन इसको पढ़े, समझे और सवाल करे।


जागो आदिवासी जागो
संदेश क्र. 19


आदिवासियों का शोषण करने का एक तरीका झूठे मुद्दे उठा कर उनको बहकाने और भड़काने का भी है| अगर कोई आपसे आकर कहे कि कौआ आपका कान लेकर जा रहा है तो कौवे के पीछे दौड़ने से पहले अपना कान छूकर देखना चाहिए| एट्रोसिटीज एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के मार्च 2018 के फ़ैसले के मामले में यही हुआ था| भारत बंद हो गया, कुछ लोगों की जान दंगों में चली गयी| तीन जजों की पीठ ने रिव्यू में पिछले फ़ैसले की कुछ शर्तें हटा दीं और आगे चल कर संसद द्वारा पारित संशोधन अधिनियम को भी सही ठहरा दिया| सुभाष काशीनाथ फ़ैसले से एट्रोसिटीज के प्रकरण में मामला दर्ज कराने की प्रक्रिया में क्या जमीनी फ़र्क पड़ता…सुविधा होती या मुश्किल होती….और आज क्या स्थिति है? कोई सवाल-जवाब इस पर नहीं हुआ| बड़े अखबारों ने बस लिख दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने कंपलसरी अरेस्ट का प्रावधान कमजोर कर दिया है, बड़े वकीलों ने भी यही बात कही और हो गया हंगामा! यह किसी ने नहीं पूछा कि एट्रोसिटीज एक्ट में कंपलसरी अरेस्ट किस धारा में लिखा है या देश में कहां ऐसा होता था? राजनीति सुलगानी थी, हो गई….सोशल जस्टिस…समाजिक न्याय से किसी को क्या लेना देना है!! 


आंध्र प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्र वाले ताजा फ़ैसले में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है| हिंदी अखबारों ने मामला गर्मा दिया और पूरा देश बहक गया| अगर कोई चर्चा होनी थी तो वह सिर्फ़ आखिरी पैराग्राफ़ 153-154 के रेशियो डेसीडेंडी पर होनी चाहिए थी, लेकिन ओबिटर डिक्टा पर खूब अनर्गल बातें हुईं| असली-जानकार आदिवासी अधिकार के एक्टिविस्ट सिर्फ़ इसलिए चिंतित थे कि पूरे मामले को कहीं पांचवीं अनुसूची के बजाए आरक्षण का मामला न बना दें स्वार्थी तत्व| पहला दौर कुछ धीमा पड़ा तो पांचवीं अनुसूची पर उल-जलूल बातें शुरु हो गईं| ऐसे नादान जिनको कांस्टीट्यूशन लॉ का अता-पता नहीं, जो अनुसूचित क्षेत्र को “पांचवीं अनुसूची क्षेत्र” कहते हैं, इन सब ने भी उलटा-सीधा खूब लिखा| इस संदेश में सामाजिक न्याय के आरक्षण पहलू और पांचवीं अनुसूची के उद्देश्य पर प्रामाणिक जानकारी देने की शुरुआत की जा रही है| पहले भाग में सीखिए आरक्षण की पूरी पहेली को बूझने का सलीका:


देश भर में सी.लीला प्रसाद राव बनाम आंध्र प्रदेश प्रकरण के फ़ैसले को लेकर जो हंगामा मचा है उसकी वजह है शासन को अ.जा.-अ.ज.जा.-अ.पि.व. की सूचियों का पुनरीक्षण करने का आदेश|  वैसे फ़ैसले के पैरा 153 में न तो “आदेश” और न ही “निर्देश” शब्द मौजूद है| इस पैरा में क्रीमी लेयर शब्द भी मौजूद नहीं है लेकिन देश भर के अखबारों ने यह खबर उड़ा रखी है| ध्यान रहे कि यह दोनों अलग अलग तरीके की कार्रवाई है| एक प्रक्रिया में किसी जाति/नस्ल के भीतर ही ज्यादा संपन्न व्यक्तियों को छांटकर अलग करना है और दूसरी प्रक्रिया में उस खास जाति/नस्ल को बाकी से काफ़ी ज्यादा संपन्न हो जाने पर पूरा ही अलग करना है| दोनों ही प्रक्रियाओं में अलग-अलग पैमाने लगा कर यह जांचना होगा कि किसी जाति/नस्ल के या उसके कुछ हिस्सों का सामाजिक पिछड़ापन बाकी पिछड़ा जातियों/नस्लों की तुलना में या उनके भीतर ही बाकी हिस्सों की तुलना में कितना रह गया है| क्रीमी लेयर फ़िल्टर को राज्य और भारत शासन अलग-अलग लागू कर सकते हैं| अन्य पिछड़ा वर्ग की सूचियां राज्य और केंद्र स्तर पर अलग अलग भी सुधारी जा सकती हैं और भारत सरकार राज्यों के सूची संशोधन एकत्र मिला कर भी यह काम कर सकती है| लेकिन अनुसूचित जाति-जनजाति की सूचियां सुधारने का काम किसी भी सरकार का नहीं, सिर्फ़ संसद का है| जाहिर है कि पैरा 153 कानूनी तौर पर दो वजहों से अवैध है| पहला, अ.जा.-अ.ज.जा.-अ.पि.व. सूचियों के संशोधन का प्रश्न उन सात सवालों के संदर्भ से बाहर है जिस सीमित काम के लिए यह संविधान पीठ गठित की गई थी| दूसरा, सुप्रीम कोर्ट संसद को कोई अधिनियम बनाने का निर्देश दे ही नहीं सकता (बेहद जरूरी होने पर ऐसा सुझाव तो दिया जा सकता है, लेकिन वह बंधनकारी नहीं होगा)| यह सूचियां संशोधित करनी चाहिए या नहीं यह लंबी-गहरी चर्चा का विषय है| सब जानते हैं कि भारत में परिवार और समुदाय की क्या अहमियत है, लेकिन संविधान में व्यक्ति और उसके अधिकारों को खास जगह देने की कोशिश की गई है| परिवार और समुदाय के भीतर की विषमता को खत्म करने के लिए राज्य-सत्ता का कर्तव्य सुनिश्चित किया गया और पंत-अंबेडकर ने इसकी पुरजोर वकालत की| इसी तौर से किसी एक जाति/नस्ल के भीतर भी विषमता को खत्म करना राज्य-सत्ता का कर्तव्य है| उप-वर्गीकरण के पक्ष और विपक्ष के तर्कों को भारत के संविधान के दर्शन के इसी संदर्भ में समझना चाहिए|  


अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के मामले में पहली बार इंद्रा साहनी प्रकरण में यह सवाल खड़ा हुआ था| अनुच्छेद 16 में चूंकि “वर्ग” के लिए आरक्षण का प्रावधान है इसलिए पूछा गया कि क्या जाति ही वर्ग हो सकती है| बहुमत ने यह माना कि भारत के खास हालात में आरक्षण के उद्देश्य से जाति को एक वर्ग माना जा सकता है लेकिन इसके लिए उस जाति के ज्यादा संपन्न लोगों को क्रीमी लेयर फ़िल्टर से अलग कर देना पड़ेगा| आज तक किसी भी राज्य सत्ता ने वर्ग को परिभाषित करने का कोई सोशियोलॉजिकल मेथड विकसित करने की कोशिश नहीं की| जाति को ही पैमाना बनाए रखना सबको उचित लगता है इसीलिए क्रीमी लेयर फ़िल्टर की पूर्व-शर्त लगी हुई है| पहले इंद्रा साहनी में और अ.जा.-अ.ज.जा. के लिए खास तौर पर जरनैल सिंह के संविधान पीठ फ़ैसले में जाति के भीतर उप-वर्गीकरण करने को सही और सुप्रीम कोर्ट के क्षेत्राधिकार में शामिल ठहराया जा चुका है| चूंकि अ.जा.-अ.ज.जा.-अ.पि.व. की सूचियों का सुधार क्रीमी लेयर फ़िल्टर लगाने से बिल्कुल अलग प्रक्रिया है इसलिए इसको गड्डमड्ड नहीं करना चाहिए| हाई/सुप्रीम कोर्ट की कोई अन्य पीठ शासन के कार्यपालिक क्षेत्राधिकार के मामले में और उसी सीमा तक परमादेश की रिट आगे चल कर जारी कर सकती है, लेकिन आज ऐसा कोई बंधनकारी आदेश नहीं दिया गया है|


अविभाजित आंध्र प्रदेश के अनुसूचित क्षेत्रों में शिक्षक के पद पर  स्थानीय जनजातियों  के लिए 100 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाले साल 2000 के सरकारी आदेश को चुनौती दी गई थी| इस मामले का निपटारा करने के लिए भारत के मुख्य न्यायमूर्ति ने एक संविधान पीठ गठित की थी जिसे पांचवीं अनुसूची के पैरा 5 उप-पैरा 1 की शक्ति के प्रयोग की सीमा के चार उप-प्रश्न समेत कुल सात सवालों के जवाब देने थे| न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने एकमत के फ़ैसले में सातों सवालों के जो जवाब दिए हैं वह सब वैसे तो विधि-सम्मत हैं लेकिन इस संदर्भ से बाहर वह आदिवासी हित को नुकसान पहुंचा सकते हैं| ध्यान देना जरूरी है कि जवाबों में कानूनी तौर पर कोई गलती नहीं है और पूरे फ़ैसले को पल्टाने की जिद्द आदिवासी-हित के खिलाफ़ जाएगी| आग्रह सिर्फ़ इतना होना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर दे कि इस फ़ैसले के जवाब इस प्रकरण के संदर्भ तक ही सीमित रहेंगे क्योंकि पांचवीं अनुसूची के ज्यादा जरूरी अनुप्रयोगों पर चर्चा हुई ही नहीं है| पांचवीं अनुसूची  के एक खराब अनुप्रयोग को बचाने के लिए ज्यादा व्यापक अधिकारों को कमजोर करना न तो समझदारी है, और न ही ईमानदारी| 


ये सारे ही सात सवाल बेमानी और आदिवासी-हित विरोधी दिशा के थे जो कि अधिवक्ताओं के. बालगोपाल और राजीव धवन के उल-जलूल तर्कों से उठे थे (जैसे कि 100% आरक्षण को पांचवीं अनुसूची की शक्ति के तहत सही ठहराने का आग्रह या इस आदेश को आरक्षण के बजाए अनुच्छेद 16 के खंड 1 के तहत वर्गीकरण मानने का आग्रह)| इन दोनों बेमानी तर्कों का जवाब इंद्रा साहनी फ़ैसले में पहले ही दिया जा चुका था| काश, पहले ही यह समझ लिया गया होता कि सरकारी बाबुओं एस. आर. संकरन और बी.डी. शर्मा की सदिच्छाओं के बावजूद संविधानिक विधि की उनकी समझ बहुत उथली थी| इस समझ के साथ अनुसूचित क्षेत्र में आरक्षण की सीमा को 50-75% तक नियत कर लिया गया होता तो यह नौबत न आई होती| ध्यान रहे कि इंद्रा साहनी फ़ैसले में बहुमत ने यह माना था कि आरक्षण की कुल सीमा 50% होगी लेकिन दूर-दराज इलाकों की खास स्थिति को देखते हुए इस नियम में कुछ छूट देना आवश्यक होगा| आंध्र प्रदेश का यह आदेश किसी तरह आदिवासी हित में नहीं है| अपने बीच के, अपनी बोली बोलने वाले लोग ही अगर स्कूलों में शिक्षक हों तो प्राथमिक शिक्षा बेहतर होगी ही, अनुसूचित क्षेत्र हों या भारत का कोई और अंचल| लेकिन सारे के सारे शिक्षक एक ही वर्ग से लेने पर आपसी तुलना और स्पर्धा की संभावना कमजोर होगी| समाज को तय करना होगा कि वह कुछ खास वर्गों/क्षेत्रों के लिए  पारंपरिक प्रशिक्षण तक ही सीमित रहना चाहता है या कि स्कूली-औपचारिक शिक्षा की ओर जाना चाहता है| अगर स्कूली औपचारिक शिक्षा की ओर बढना है तो फिर मुख्यधारा के प्रेरक तत्वों से नहीं बच सकते| साथ ही अनुसूचित जाति और पड़ोसी जिलों से आकर बसी अनुसूचित जनजातियों के हितों का भी ध्यान रखना होगा| यह एक गंभीर और तहदार मामला है जिसका हल लगन के साथ खोजने से आएगा, अवसरवादी राजनीति की गर्मागर्म बहसों से नहीं|


आधुनिक लोकतंत्र में सामाजिक न्याय पर हमेशा जोर रहता है| लेकिन भारत में तो सामाजिक न्याय के सिद्धांत को संविधान की उद्देशिका में भी शामिल किया गया है, और इसके कुछ उपायों को भी| समाजिक न्याय के इन उपायों में सबसे ज्यादा विवादित मामला है आरक्षण का, और उसमें भी खास तौर पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण| भारत का संविधान वजनी और बोझिल होने के कारण नागरिक इसे पढने की मेहनत नहीं करते| जब तक संविधान को पूरा एक साथ पढा न जाए तब तक इसके अलग-अलग प्रावधानों का सही मतलब समझना असंभव है| दूसरी उलझन है भारत के उच्चतम न्यायालय की संरचना की वजह से इसके फ़ैसलों को समझ सकने की उलझन| संविधान लागू होने के पहले दशक में ही न्यायमूर्ति फ़जल अली ने कह दिया था कि डेल्ही लॉज एक्ट प्रकरण में असल फ़ैसला क्या था यह समझना मुश्किल है, जबकि वह खुद उस पीठ का हिस्सा रहे थे| “संविधान सबके लिए” नाम की किताब में इस उलझन का हल निकालने की कोशिश की गई इसीलिए यह किताब छत्तीसगढ के गांव-गांव तक पहुंची| आप सबको एक शुरुआत करनी चाहिए इंद्रा साहनी (प्रथम) फ़ैसला पढने से| हजार पृष्ठों से भी लंबे इस फ़ैसले को पढने की शुरुआत के लिए दो पेज की एक सारणी बना कर जन-विधि केंद्र द्वारा प्रसारित की गई है| नौकरी में आरक्षण के मामले में उच्चतम न्यायालय का अब तक की सबसे बड़ा, 9-जजों की पीठ का इंद्रा साहनी(प्रथम) फ़ैसला काफ़ी चर्चित है| आरक्षण के घोर विरोधी और कट्टर प्रचारक दोनो ही तरह के लोग इस फ़ैसले का उद्धरण देते रहते हैं| यह और बात है कि इस फ़ैसले के निर्देश और सुझाव किसी भी वर्ग को स्वीकार नहीं हुए| इस से भी ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि विविध बिंदुओं पर बहुमत क्या था इसको लेकर काफ़ी गलतफ़हमियां फ़ैली हुई हैं| संविधान लागू होने से लेकर 1992 तक के सभी बड़े फ़ैसलों का जिक्र तो इसमें है ही लेकिन बाद के आने वाले सालों के फ़ैसलों के बीज भी यहां मौजूद हैं| अनुच्छेद 16 पर संविधान सभा में हुई बहस की समाप्ति पर डॉ. अंबेडकर की सफ़ाई इसमें शामिल है| आरक्षण से जुड़े तकरीबन हर मुद्दे को इस फ़ैसले में छुआ गया है इसलिए समाजिक न्याय और समता के प्रति जागरूक सभी नागरिकों को इसे पढना चाहिए| न्यायमूर्ति रेड्डी ने अपने और न्यायमूर्तियों काणिया, वेंकटचलिया और अहमदी के लिए साझा मत लिखा जबकि बाकी पांच- पांडियन, ठोमेन, सिंह, सावंत और सहाय- ने अपना-अपना स्वतंत्र मत लिखा| तकरीबन हजार पृष्ठ के इस फ़ैसले को पढना आसान नहीं है इसलिए पहली बार एक सारणी में सभी 9 न्यायमूर्तियों के मतों का सार दिया जा रहा है| सभी छह लिखित मतों में मोटे तौर पर उन आठ सवालों का जवाब दिया गया है जो विरोधी पक्षों के अधिवक्ताओं ने मिल-जुल कर तय किए थे| कुछ-कुछ समझ बन जाने के बाद आप चाहें तो अंग्रेजी में सभी न्यायमूर्तियों के मतों का सार अलग-अलग पढ सकते हैं| न्यायमूर्ति सिंह के सिवा बाकी न्यायमूर्तियों के फ़ैसले के आखिर में सार के एक-दो पैराग्राफ शामिल हैं| तीसरे चरण में आप पूरा फ़ैसला पढ सकते हैं| 


अगर सामाजिक न्याय के लिए आपकी प्रतिबद्धता है तो पढाई-लिखाई की इतनी मेहनत तो करनी ही पड़ेगी| आरक्षण के प्रावधानों पर अनर्गल-भावनात्मक बहसबाजी इसी लिए चलती रहती है क्योंकि नागरिक सामाजिक न्याय के लिए जरूरी दिमागी कसरत से बहुत जी चुराते हैं| पूरा का पूरा संविधान पढे बगैर और संविधान पीठों के फ़ैसलों को समझे बगैर आरक्षण की गुत्थी सुलझेगी नहीं| जहां तक हो सके गर्मागर्म बहसों से बचिए| खुद पढ कर एक-एक नागरिक अपनी समझ साफ़ करे|
(भाग-दो में पांचवीं अनुसूची के उद्देश्य और उसके प्रावधानों की कानूनी व्याख्या)
संपर्क - छत्तीसगढ़ आदिवासी छात्र संगठन