आरक्षण के विषय पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों को लेकर जारी कुचर्चा पर

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आरक्षण के विषय पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों को लेकर जारी कुचर्चा पर 
सामाजिक न्याय मंच, छत्तीसगढ की सार्वजनिक घोषणा


 पिछले कुछ सालों से आरक्षण के विषय पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों को लेकर हमेशा आरक्षित वर्ग उद्वेलित रहा है| लॉकडाउन के दौरान आए फ़ैसलों को लेकर भी ऐसा ही उन्मादी माहौल बनता दिख रहा है| ऐसे में प्रामाणिक कानूनी जानकारी और समझ की कमी स्थिति को और भी खतरनाक बनाती है| दुर्भाग्य से आरक्षित वर्ग के कुछ जन-प्रतिनिधि और संगठन भी कुप्रचार के प्रभाव में कुचर्चा में शामिल हो जाते हैं| आरक्षण के प्रावधानों को अधिनियम या विनियम बना कर संविधान की नौवीं अनुसूची में डालने की मांग ऐसी ही एक कुचर्चा का उदाहरण है| चूंकि इससे आरक्षित वर्ग की बौद्धिक क्षमता की छवि खराब होती है और भावी रणनीति-कार्ययोजना पर दुष्प्रभाव पड़ता है, इसलिए अनुसूचित जाति-जनजाति के कुछ अधिवक्ताओं द्वारा जन-हित में यह घोषणा की जा रही है|


उच्च न्यायपालिका द्वारा सामाजिक सुधार संबंधी कानूनों की न्यायपालिक समीक्षा से बचने के लिए पहले संविधान संशोधन 1951 द्वारा नौवीं अनुसूची शामिल की गई थी| अनुच्छेद 31ख के अनुसार नौवीं अनुसूची में शामिल किसी अधिनियम या विनियम को इस आधार पर न्यायपालिका द्वारा खारिज नहीं किया जा सकेगा कि वे भाग तीन के मूलभूत अधिकारों से असंगत हैं| 24 अपैल 1973 को सुप्रीम कोर्ट की सबसे व्यापक पीठ ने केशवानंद भारती बनाम केरल फ़ैसले में “संविधान का मूल ढांचा” सिद्धांत दिया| 11 जनवरी 2007 को 9-जजों की एक पीठ ने एकमत से आई. आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु फ़ैसले में इस आधार पर संभव चुनौती या न्यायिक समीक्षा पर सफ़ाई दी| यह कहा गया है कि अनुच्छेदों 14, 19 और 21 में झलकने वाले संविधान के मूल ढांचे से असंगत होने का आरोप होने पर नौवीं अनुसूची में शामिल किसी भी कानूनी प्रावधान को चुनौती दी जा सकेगी| अगर “अधिकार-टेस्ट” और “अधिकार का प्रभाव-टेस्ट” पूरा होता है तो असंगत प्रावधान खारिज किया जा सकेगा|


दूसरे शब्दों में संसदीय बहुमत का दुरुपयोग करते हुए कोई कानूनी मनमानी अब नहीं की जा सकेगी| चूंकि “समता” को संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा ठहराया जा चुका है इसलिए आरक्षण के किसी प्रावधान को नौवीं अनुसूची में रख देने पर भी इस आधार पर चुनौती दी जा सकेगी| ऐसी कोशिशें बेमानी हैं और मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने वाली हैं| खुद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठों ने माना है कि फ़ैसले देने में उससे गलती हो जाना संभव है| लेकिन ऐसी गलतियां जब भी हों उसका प्रभावी विरोध अकादमिक निर्णय-समीक्षा के लेखों के ही माध्यम से किया जाना चाहिए| सुप्रीम कोर्ट या उसके न्यायमूर्तियों पर संदर्भ से बाहर जाकर आलोचना करना या अनर्गल चर्चा करना (जैसे कि सुप्रीम कोर्ट के घेराव का आह्वान) लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को कमजोर ही करेगा|