आरक्षित पदोन्नति रिवर्ट होने की जिस दुर्घटना की आशंका लगातार संविधान-जानकार द्वारा जाहिर की गई

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आरक्षित पदोन्नति रिवर्ट होने की जिस दुर्घटना की आशंका लगातार संविधान-जानकार द्वारा जाहिर की गई थी, उसके पहले नजारे सामने आ गए हैं| छग राज्य बिजली कंपनीज का दिनांक 19 मार्च 2020 का एक पत्र सामने आया है जिसमें उसने शासन को संबोधित करते हुए अपने कार्मिकों की पारिणामिक वरिष्ठता छीन लेने का अपरोक्ष दावा किया है| यह पत्र आरक्षित वर्ग अधिकारी कर्मचारी संघ की आपत्ति जताने के बाद 7 और 20 जनवरी को जारी किए गए पदोन्नति आदेशों में भेदभाव के आरोप की सफ़ाई देते हुए लिखा गया है|


 


उच्च न्यायालय ने 2003 के नियम क्र.5 को खारिज करते हुए 4 फ़रवरी 2019 के आदेश के पैरा 5 में नतीजे लागू होने का जिक्र भी किया था| इस आदेश से 2003-19 की आरक्षित पदोन्नतियां अवैधानिक हो गई हैं| इनके संरक्षण के लिए कोई प्रावधान शामिल करते हुए नए नियम बनाने की कोई कोशिश भी नहीं हुई है| बिजली विभाग ने न्यायालय के आदेश का अनुपालन करते हुए पदोन्नति की कार्रवाई में आरक्षित वर्ग के अपने कार्मिकों की पारिणामिक वरिष्ठता छीन ली है| लंबित प्रकरण 91/19 की बहस में जनवरी-फ़रवरी में आरक्षित वर्ग के कार्मिकों को मेरिट-वरिष्ठता होते हुए भी पदोन्नति से बाहर रखने की शिकायत मुख्य न्यायमूर्ति से की गई थी| 19 मार्च के पत्र से साफ़ हो गया है कि वंचित कार्मिकों की वरिष्ठता आखिरी ग्रेडेशन लिस्ट के बजाए आरक्षित पदोन्नति को नजर अंदाज करते हुए सिर्फ़ नौकरी ज्वाइन करने की तारीख से मापी गई है| ऐसा इसलिए हुआ कि 4 फ़रवरी 2019 को उच्च न्यायालय द्वारा संविधान पीठों के निर्देशानुसार नया नियम बना लेने की सलाह आरक्षित वर्ग के ठेकेदारों ने नहीं मानी| (डिप्टी कमांडेंट नरेंद्र सिंह, विश्वास मेश्राम, शंकरलाल उईके और रामकृष्ण जांगड़े ने सब कुछ जानते हुए भी कार्मिक हित साधने के बजाए जातिवादी कड़वाहट फ़ैलाने पर ध्यान दिया) राजनैतिक चालबाजी और चंदाखोरी जारी रखने के लिए आरक्षित वर्ग के हजारो कार्मिकों के अधिकारों के साथ यह जुआ खेला गया| लीगल सेल और अधिवक्ता मनोज गोरकेला ने आरक्षित वर्ग के हजारों शासकीय सेवकों से इसके पीछे की असली वजह लगभग चार महीने तक छुपाए रखी|


 


ध्यान रहे कि लीगल सेल और आदिवासी समाज के एक चर्चित पशु चिकित्सक ने अप्रैल माह में सोशल मीडिया में यह दावा किया था कि छग में आरक्षित पदोन्नति रिवर्ट होने का कोई खतरा नहीं है| यह स्वार्थी तत्व हजारों हस्तक्षेप याचिकाएं लगाने और 22 अक्टूबर का अवैधानिक नियम अधिसूचित कराने की गलतियों के लिए माफ़ी मांगने को तैयार नहीं हैं| शायद अब भी संविधान के स्थापित जानकार की सलाह के मुताबिक नए नियम बनाकर नुकसान को कम किया जा सकता है| लेकिन अपने ही लोगों के झूठ और धोखेबाजी का इलाज किए बगैर तो यह नहीं होने वाला है| कई शासकीय अधिकारी और कार्मिक/जन-प्रतिनिधि अक्टूबर का नियम क्र.5 बनाने और उसके समर्थन के लिए शोर मचा कर समाज और शासन के संसाधन बेवजह फ़ूंकने में शामिल रहे हैं| इनके व्यवहार से दिखता है कि आरक्षित पदोन्नति पलटने के भयानक खतरे के लक्षण और उसकी गंभीरता से यह परिचित नहीं हैं| समझदारी और नैतिकता के अभाव वाले ऐसे लोगों को चुन चुन कर आगामी प्रक्रिया से दूर करना होगा|


 


बादशाह अकबर प्रशिक्षित न होते हुए भी भारत का महानतम शासक माना गया है क्योंकि उसे योग्य सलाहकार चुनने की तमीज थी| पदोन्नति में आरक्षण मामले में इस सीख को गंभीरता से लेने की जरूरत है| ध्यान दीजिए कि उच्च न्यायालय में जाति विशेष के न्यायमूर्तियों ने 2013 में सिर्फ़ कमजोर तकनीकी आधार के सहारे और 2019 में शब्दों के घुमाव के सहारे आरक्षित वर्ग के हितों को सुरक्षित रखने का भरसक प्रयास किया| छत्तीसगढ में अनारक्षित वर्ग के जिन कार्मिकों ने वर्ष 2004 में पदोन्नति नियम 2003 को चुनौती दी थी उन्होंने 15 साल तक धैर्य रखा| इन लोगों ने न तो कभी अंतरिम राहत पर जोर दिया और न ही मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने के लिए जोर लगाया| इसकी तुलना अन्य राज्यों से कर के देखिए| छत्तीसगढ शांति का टापू है क्योंकि यहां जातिवादी कड़वाहट काफ़ी कम है| बंधुता की इस भावना को संरक्षित करते हुए, संविधान पीठों के निर्देशों का सम्मान करते हुए, विशेषज्ञों की राय के मुताबिक, खुली चर्चा कर के पदोन्नति में आरक्षण मसले का हल निकाला जाना चाहिए|