धार्मिक मान्यताएं और संवैधानिक कानून" पर कुछ साथियों की सार्थक प्रतिक्रिया

🔥36वां एपिसोड,शाम,दिनांक 04-05-2020🔥
🔥मेरे 33वें एपिसोड "धार्मिक मान्यताएं और संवैधानिक कानून" पर कुछ साथियों की सार्थक प्रतिक्रिया🔥
[03/05, 12:39 PM] Sureshchendra: साधुवाद साहब! यह बात तो सच है कि आज भारत का हर जघन्य अपराध तथाकथित हिन्दू धर्मग्रंथों और धर्माधिकारियों से प्रेरित है, पर इसके लिए सबसे ज्यादा अपराधी वे शोषित लोग हैं जो ऐसे गलीज धर्म,और सड़े हुए धर्मग्रंथों तथा निर्लज्ज धर्माधिकारियों को गधे,घोड़े और खच्चर की तरह ढो रहे हैं, पर फिर भी एक बात और है कि जबतक इस देश में एक भी पाखण्डी पंडा-पुरोहित रहेगा, तबतक मूर्खों और शोषितों की मूर्खता और शोषण शायद ऐसे ही बरकरार रहेगा, वही यह भी अकाट्य सत्य है कि, जब तक मूर्ख लोग पैदा होते रहेंगे, तब तक धूर्त और धूर्तों की धूर्तता को कोई खतरा नहीं है। इसलिए हमें अपने बौद्धिक विकास की तरफ ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा🙏


[03/05, 12:42 PM] Vinod Gzib: *सर जी इस लेख के द्वारा आपने  आजादी से पहले ओर आजादी के बाद यानी वर्तमान मे, जो भारत मे घटनाक्रम हो रहे है, उन पर बहुत अच्छी तरह से प्रकाश डाला है। पढ कर सब कुछ समझ मे आता है। शुद्र समाज से साधू ब्राह्मण समाज तक,  और ईश्वर, देवी देवताओं से लेकर संविधान तक का सफरनाम  बहुत अच्छी तरह से समझ मे आता है।*    ...                        *और अब समय आ चुका है, शुद्र समाज को संविधान की हिफाजत करनी होगी, नही तो मनुवादी संविधान को खत्म कर के फिर से मनुवादी संविधान लागू करने मे लगे हूऐ है।*.              *सर जी बहुजन समाज को सचेत करने के लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद*.               *जय भीम जय संविधान जय भारत जय शुद्र समाज*.         🙏🙏🙏🙏🙏             *विनोद सागर गाजियाबाद 9313396927 =8920331394*


[03/05, 5:07 PM] Ram Nandkumar: 👆बिल्कुल सर, यहां तो धर्म,  पाप कर्म को और आसान बना देता है,, "कितना भी पाप कुकर्म करो, सिर्फ गंगा में डुबकी लगा लो, सारे पाप स्वाहा"  तो फिर क्यों न पाप करे कोई? शास्त्रीय देवताओं ने जितने बलात्कार किये हैं वे सब प्रेरणा स्रोत जो हैं।


 प्रस्तुति- शूद्र शिवशंकर सिंह यादव


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धर्मिक स्त्रियां धर्म के इन आदेशो को कितना सही मानती हैं ? आज भी समाज में विधवा स्त्री का बहुत ज्यादा सम्मान नहीं होता है ,अधिकतर विधवा स्त्री को अपशकुन ही समझा जाता है ।आप वृन्दावन सहित देश के बहुत से हिस्सों में विधवाओ के लिए बने आश्रमो में देख सकते हैं की उनकी क्या दुर्दशा होती है । इस बार वृंदावन में विधवाओ ने सैकड़ो साल की कुरीति तोड़ते हुए होली मनाई । अंग्रेजो के आने से पहले सती प्रथा समाज में कितनी प्रचलित थी यह बताने की जरुरत नहीं है , समाज में विधवा स्त्रियों को जला के उन्हें देवी मान लिया जाता था । समाज में विधवाओ के प्रति यह क्रूरता आई कैसे ?कौन था विधवाओं की दुर्दशा का जिम्मेदार ?जानते हैं - महाभारत के आदिपर्व में उल्लेख है की जिस प्रकार धरती पर पड़े हुए मांस के टुकड़े पर पक्षी टूट पड़ते है , उसी प्रकार पतिहीन स्त्री पर पुरुष टूट पड़ते हैं । स्कन्द पुराण के काशी खंड के चौथे अध्याय में कहा गया है "विधवा द्वारा अपने बालो को संवार कर बाँधने पर पति बंधन में पड़ जाता है अत:विधवा को अपना सर मुंडित रखना चाहिए। उसे दिन में एक बार ही खाना चाहिए वह भी काँसे के पात्र में , या मास भर उपवास रखना चाहिए । जो स्त्री पलंग पर सोती है वह अपने पति को नर्क डालती है , विधवा को अपना शरीर सुगंध लेप साफ़ नही करना चाहिये और न ही श्रंगार करना चाहिए । उसे मरते समय भी बैलगाड़ी पर नहीं बैठना चाहिए , उसे कोई भी आभूषण तथा कंचुकी नहीं पहननी चाहिए कुश चटाई पर सोना चाहिए और सदैव श्वेत वस्त्र पहनने चाहिए ।उसे वैशाख , कार्तिक और माघ मास में विशेष व्रत रखने चाहिए । उसे किसी शुभ कार्य में हिस्सा नहीं लेना चाहिए और हमेशा हरी का नाम जपना चाहिए । विधवा का आशीर्वाद विद्वजन ग्रहण नहीं करते मानो वह कोई सर्प विष हो । विधवाओं के प्रति यह आदेश धर्म का है , आज भी स्त्रियां ही सबसे अधिक धर्मिक प्रवृति की होती हैं ...यदि स्त्रियां धर्म का साथ छोड़ दें तो धर्म नाम की दुकान एक दिन में बंद हो जायेगी । तो आज की धर्मिक स्त्रियां, विधवाओं के प्रति धर्म के इन आदेशो को कितना सही मानती हैं ? - केशव (सजंय)..
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