फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामले में सचिव स्तर के लग - भग 10 अधिकारियों पर सबूत के साथ लगा अब तक का बड़ा आरोप, कार्यवाही की मांग भूपेश सरकार से

फर्जी जाति प्रमाणपत्र मामले में सचिव स्तर के लग - भग 10 अधिकारियों पर सबूत के साथ लगा अब तक का बड़ा आरोप, कार्यवाही की मांग भूपेश सरकार से


सर्व आदिवासी समाज हमेशा से फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरियां कब्जाने को गंभीर मुद्दा मानता रहा है| मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुद्दे की नजाकत को समझते हुए सार्वजनिक बयान दिया था कि छह महीने में ऐसे सभी लोगों को प्रक्रिया पूरी करके बाहर निकाल दिया जाएगा| जब इस बयान के बाद साल भर बीत गया तो सबने समझ लिया कि सिस्टम जो धोखेबाजों को बचाता आ रहा है मुख्यमंत्री के पास भी उसका इलाज नहीं| आरक्षित वर्ग के संगठनों द्वारा नौकरशाहों पर लापरवाही का इलजाम लगाने भर से कुछ नहीं होता, क्योंकि वे आरोपित कृत्य, उल्लंघन और प्रमाण पर सुस्पष्टता नहीं दे पाते| कठोर कार्रवाई करने के सामान्य प्रशासन विभाग के हर साल के पारंपरिक पत्र से भी 1975 से अब तक कोई खास असर नहीं पड़ा| अब पहली बार जन-विधि केंद्र रायपुर ने 7-8 वरिष्ठ अधिकारियों पर इस मामले में सबूत के साथ सेवा शर्तों के उल्लंघन और क्रिमिनल कृत्य का आरोप लगाया है| मजे की बात यह है कि यह सबूत 15 हल्बा-कोष्टि कर्मचारियों के एक ही प्रकरण में छत्तीसगढ उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के तीन स्तर के फ़ैसलों में ही सीमित हैं| सामान्य प्रशासन विभाग दो साल से राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग से जानकारी छुपा रहा था| अब सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश सामने आ गया जिसमें महाधिवक्ता जे.के.गिल्डा उपस्थित के होते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने देर से दाखिल करने की वजह से राज्य की विशेष अनुमति याचिका खारिज की थी| उच्च स्तरीय छानबीन समिति के अध्यक्ष ने साल 2015 में  इनके जाति प्रमाण पत्र गलत पाने पर संबंधित विभाग को सूचित करने और एफ़. आई. आर. कराने की जगह अपनी शक्ति-सीमा से बाहर जाकर चौदह कोष्टि कर्मचारियों की सेवा सुरक्षित की थी| निश्चित काल खंड में किए गए गैर-कानूनी काम और किन प्रावधानों का उल्लंघन हुआ इसका पहली बार साफ़ साफ़ आरोप लगाया जा सका है| सारे जरूरी तथ्य अदालती फ़ैसले में ही कहे जाने के कारण एवीडेंस एक्ट की अपेक्षा भी पूरी हो जाती है, अतिरिक्त कागजात जुटाने की जरूरत नहीं है| लोक सेवा (आचरण) नियम 1965 के नियम 3 व 3-क, आरक्षण अधिनियम 1994 की धाराओं 5 व 6(1) और प्रमाणीकरण अधिनियम 2013 की धारा 23 का उल्लंघन आरोपित है| सिर्फ़ विभागीय जांच और कार्रवाई ही नहीं क्रिमिनल कृत्य के लिए इन अधिकारियों को 1 साल के लिए जेल भी जाना पड़ सकता है| लोक सेवा विवादों के इतिहास में पहली बार आईएएस, आईएफ़एस और न्यायिक सेवा के लगभग 8-10 आधिकारियों के खिलाफ़ जांच करने के आधार उपलब्ध कराए गए हैं| इनमें सामान्य प्रशासन, विधि विभाग और आदिम जाति विकास के सचिव पदों पर रहे निधि छिब्बर, के. मुरुगन, आशीष कुमार भट्ट, विकास शील, रोहित यादव, ए.के. सामंत रे और आर. एस. शर्मा के नाम शामिल हैं| देखना होगा कि भूपेश बघेल अपनी जबान की इज्जत रखते हैं या नौकरशाहों की विकेट बचाते हैं| मामले की बारीकियां समझने के लिए बी.एस. रावटे- कार्यकारी अध्यक्ष, छत्तीसगढ सर्व आदिवासी समाज की लिखी चिट्ठी अटैचमेंट में देखिए|


 


सेवा में,
मुख्यमंत्री-छत्तीसगढ शासन,
मुख्यमंत्री निवास, सिविल लाईन, रायपुर|


विषय: हल्बा-कोष्टी फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र के एक प्रकरण विशेष [संदर्भ- SLP(civil) 23294/2018, W.A. 531/2016, W.P.(s) 147/2016] में लापरवाही करने के आरोप में वरिष्ठ अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु निवेदन|


मान्यवर,
 आपने सार्वजनिक तौर पर राज्य में फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र के विषय में कठोर कार्रवाई करने की घोषणा की है| आपकी सरकार के कार्यकाल में भी रस्म अदायगी के लिए प्रतिवर्ष एक बार सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा ऐसी ही घोषणा का परिपत्र जारी किया जाता रहा है| इस पत्र के द्वारा आपका ध्यान हल्बा-कोष्टी के एक प्रकरण विशेष की ओर दिलाते हुए इसमें लापरवाही करने के आरोप में वरिष्ठ अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने हेतु निवेदन है|


महाराष्ट्र मूल के कोष्टि जाति के हजारों सदस्यों ने खुद को हल्बा-कोष्टि बताते हुए फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र बनवा कर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश राज्यों में लोक सेवा में अनुसूचित जनजाति के पदों पर अनधिकृत कब्जा किया हुआ है| उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ ने महाराष्ट्र विरुद्ध मिलिंद प्रकरण में 28 नवंबर 2000 को यह स्पष्ट कर दिया कि कोष्टि जाति के लोग हल्बा जनजाति से संबद्ध होने का दावा नहीं कर सकते| चूंकि इस प्रकरण में फ़ैसला आने में पंद्रह साल लग गए थे, और प्रथम प्रतिवादी की मेडिकल पढाई की महत्ता को देखते हुए, अंतरिम राहत पाए हुए प्रतिवादियों की फ़ैसले की तारीख तक स्थायी/पूर्ण हो चुकी की नियुक्तियां और सीटें सुरक्षित कर दीं| फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र धारियों के समूहों ने कई बहाने बना कर अपनी नौकरी सुरक्षित करने की कोशिश की| सबसे प्रमुख बहाना यह था कि 28 नवंबर 2000 तक स्थायी/पूर्ण हो चुकी सारी नियुक्तियां और सीटें सुरक्षित हैं| उच्चतम न्यायालय की कुछेक दो-सदस्यीय पीठों से ऐसी राहत इन धोखेबाजों को मिलती भी रहीं जबकि तीन-सदस्यीय पीठें (भारत संघ विरुद्ध दत्तात्रय, फ़ूड कार्पोरेशन विरुद्ध जगदीश बलराम बहिरा) स्पष्ट करती रहीं कि उच्चतम न्यायालय से जिनको विनिर्दिष्ट करते हुए राहत नहीं मिली ऐसे किसी भी धोखेबाज की नौकरी सुरक्षित नहीं की गई है| बहिरा फ़ैसले में यह भी साफ़ कर दिया गया कि अगर किसी व्यक्ति का जाति प्रमाण पत्र असत्यापित हो जाता है अथवा सत्यापित नहीं किया जा पाता तो उसके विरुद्ध कार्रवाई करते हुए यह ध्यान देने की जरूरत नहीं है कि उसने जान-बूझ कर धोखा किया अथवा नहीं|


भारत शासन के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने पहली बार 10 अगस्त 2010 को एक ऑफ़िस मेमोरेंडम जारी कर फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र धारी धोखेबाजों की नौकरी सुरक्षित की| उच्चतम न्यायालय ने इस ऑफ़िस मेमोरेंडम को वर्ष 2017 के बहिरा समेत दो फ़ैसलों में अवैध ठहरा दिया| इसी विभाग ने फ़िर 8 अप्रैल 2019 को एक ऑफ़िस मेमोरेंडम जारी कर धोखेबाजों को सुरक्षा देने की कोशिश की| बी.के. मनीष विरुद्ध डॉ. सी. चंद्रमौली के अवमानना प्रकरण 84/2020, के आदेश दिनांक 14 फ़रवरी 2020 में उच्चतम न्यायालय ने इस दूसरे ऑफ़िस मेमोरेंडम को सुधार लेने का अवसर दिया है|


छत्तीसगढ शासन भी लगातार जाति प्रमाण पत्र धारी धोखेबाजों को सुरक्षा प्रदान करता रहा है| संदर्भित प्रकरण जिसमें कोष्टि जाति के पंद्रह लोक सेवक शामिल हैं इसका सबसे अच्छा उदाहरण है| इन पंद्रह लोक सेवकों में से चार तो सामान्य प्रशासन विभाग में ही पदस्थ हैं| इस प्रकरण का कालक्रम और न्यायालय के निर्णयों समेत दस्तावेज संबद्ध अधिकारियों की इस अवैध संरक्षण में संलिप्तता प्रथम दृष्ट्या सिद्द कर देते हैं| निम्नलिखित वरिष्ठअधिकारियों पर व्यक्त आधारों पर सेवा नियमों और अधिनियमित विधि के प्रावधानों के अनुरूप विभागीय/दांडिक-विधि कार्रवाई करना न्यायोचित होगा:
 1 अक्टूबर 2011 को पदस्थ सचिव-सामान्य प्रशासन विभाग जिसके परिपत्र द्वारा धोखेबाजों को सुरक्षा दी गई| उच्चतम न्यायालय के दत्तात्रय फ़ैसले से साफ़ है कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग का दबाव अथवा किसी अन्य आधार होने पर भी यह परिपत्र अवैध था|
 2 अप्रैल से 28 दिसंबर 2015 तक पदस्थ सचिव- आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग जिसने उच्च स्तरीय छानबीन समिति के पदेन अध्यक्ष रहते हुए विषयक अधिनियम 2013 की शक्तियों से परे जाकर अवैध संरक्षण प्रदान किया|
 1 जुलाई 2016 से 28 जून 2018 तक पदस्थ सचिव- सामान्य प्रशासन एवं विधि विभाग जिन्होने प्रकरण में अभिमत लेकर 30 दिनों में रिट अपील और 90 दिनों की सर्वज्ञात समय सीमा में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने में कोताही की जो कि उन फ़ैसलों में दर्ज है| खास तौर पर उच्चतम न्यायालय द्वारा देरी के आधार पर प्रकरण खारिज किया जाना दुखद है|


गलत/फ़र्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे आरक्षित पद कब्जाने को उच्चतम न्यायालय ने संविधान के साथ बेईमानी करना ठहराया है| चूंकि इस प्रकरण में आपको प्रमाण और तर्क समेत संदिग्धों की जानकारी दी जा रही है, आपसे आशा है कि आप यथाशीघ्र कठोर कार्रवाई करेंगे जिससे इस विषय पर छत्तीसगढ शासन की स्थिति और मंशा का सभी संबद्ध पक्षों को साफ़ साफ़ पता चल जाए| भविष्य में शासन द्वारा लंबित अथवा नवीन प्रकरणों में उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने में भी यह सहायक होगा|


निवेदक:
बी.एस. रावटे
कार्यकारी अध्यक्ष- छत्तीसगढ सर्व आदिवासी समाज|


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